जाली नोटों के आंकड़े! 

​क्या आप नकली नोट लेकर बँक में जमा कराने कि सोच भी सकते हो!!!

लेकिन हमारा बिकाऊ मिडीया तो ऐसी ही उम्मीद लोगों में फैला कर झूठ का माहौल बनाने में लगा हुवा हैं। एक खबर लगभग हर चैनल पर बार-बार सुनाई अथवा पढ़ने में आ रही कि नौटबंदी पर सरकार के जाली-नोट का दावा झूठा सिद्ध हो रहा जिसकी वजह यह बता रहे कि RBI गवर्नर उर्जित पटेल यह आंकड़ा नहीं बता सके कि कितनी जाली नोट नौटबंदी के दौरान बँक में जमा कि गई! 

अब इस खबर से मिडिया व एयर कंडीशन में बैठकर मक्कारी भरी पत्रकारिता का झंडा गाढने वाले दलालों का दिमाग भी समझे… 

पहली बात, ये लोग उर्जित पटेल से यह जानना चाहते हैं कि कितनी जाली नोट बँक में जमा हुई! क्या ये यह नहीं जानते कि बँको में जाली नोट पहचाने कि मशीन लगी होती हैं अर्थात जो बनावट से ही नकली हैं वह छट कर अलग निकल जाए। अब जो नोट इस तरह से छट कर अलग निकल गई हो वह तो वैसे भी बँक में जमा नहीं होती… फिर इसका आंकडा भला उर्जित पटेल कैसे दे सकते हैं! 

दुसरी बात, जिसके पास भारी मात्रा में एसी नकली नोट होगी वह क्या एसी हिम्मत कर सकता हैं कि उसे ले जा कर बँक में जमा करने की कोशिश भी करे! 

तीसरी बात, जिस तरह कि भारी नकली नोट के स्वाहा होने का दावा सरकार कर रही हैं जिसे पाकिस्तान कि ISI ने छापा व जिसका इस्तेमाल आतंकवाद फैलाने में किया जा रहा था, यह उस तरह कि नकली नोट हैं जो पिछली सरकारों कि मूर्खता या युँ कहे गद्दारी के चलते बिल्कुल असली कि तरह छापा गया था… यानी की बँको कि मशिने भी जिन्हें नहीं छाँट सकती थी। एसी स्थिति में भी सवाल वही… कि जाली नोटों का आंकड़ा निकलेगा कैसे? लेकिन यहाँ यह जरूर तय हैं कि जो नोट पाकिस्तान व आतंकवादी संगठनों के हाथों में धरी रह गई वह तो वहीं स्वाहा हो गई और वो भी बगैर किसी आंकड़े के! जाहिर हैं यह आंकड़ा भी भारी ही होगा। और जो कुछ उनके दलालों द्वारा यदी बँको में जमा भी कर दी गई होगी, तो चिंता की बात इसलिए नहीं क्यूँ की वह बेहद मामूली रकम होगी जो पकड़ी ना जा स। फिर भी यदी रकम बड़ी हुई तो जाली नोटों का आंकड़ा सरकार को मिले ना मिले, जमा करने वालो का आंकड़ा जरूर सरकार के पास पहुंच चुका हैं जिसकी कार्यवाही देखने को मिली ही रही हैं। 

अरे भाई, यहाँ तो बडी “मेहनत” से कमाया काला धन भी लोग बँक में जमा कराने से डर रहे तो जाली-नोट बँक तक पहुंचा कर मिडिया वालों के लिए आंकड़े कहाँ से जमा हो! जरा सोचिए तो!!!!

तो फिर इन पत्रकारों कि जाली नोटों वाली इस खबर का क्या तुक….. भाई, यह और कुछ नहीं…. खिसियाई बिल्ली खंभा नौचे! सुना हैं न!!! 

जयहिंद 

“दंगल” से मीट लोबी को बढ़ावे का षडयंत्र

“दंगल” से मीट लोबी को बढ़ावे का षडयंत्र

सुदर्शन न्यूज कि दंगल कि “असत्य” कथा का सत्य बताया #BindasBol में…. षडयंत्रों की भरमार, पहलवानों की भारतीय संस्कृति पर चोट। 

क्या हैं मुद्दा?

दंगल को अमीर ने जिस पहलवान महावीर पोगाट कि सत्य कथा पर आधारित बताया हैं वे यथार्थ में एक शुद्ध शाकाहारी पहलवान हैं। 

सुदर्शन न्यूज को वे जाहिर कर चुके हैं कि ना ही उन्होंने कभी मांसाहार को कभी छुआ हैं और ना ही कभी उन्होंने अपनी बेटियों को मांसाहार करवाया हैं। 

यहाँ तक कि उनकी दोनो बेटियाँ गीता फोगाट व बबीता फोगाट स्वयं अपने पीता कि तरह शुद्ध शाकाहारी हैं। उन्होंने इस फिल्म को स्वयं के जीवन पर कलंक बताया। 

महावीर फोगाट जो कि स्वयं एक पहलवान हैं व बजरंगबली के परम भक्त हैं लेकिन उनकी एसी भक्ति को उनके जीवन पर आधारित बताये जाने वाली तथाकतित फिल्म दंगल से पूर्णतया नदारद कर दिया गया। 

अन्य पहलवानों की राय

इस मुद्दे पर बहस के लिए कई नामी पहलवान सुदर्शन न्यूज पर आमंत्रित किये गये थे जिन्होंने दंगल में दिखाए गए मांसाहार को बढ़ावा देने जैसे दृश्य पर कडी प्रतिक्रिया व्यक्त की। 

एक नवयुवा पहलवान आदित्य परासर के अनुसार भारत के जीतने भी अखाड़े जहाँ पहलवानी सिखाई जाती हैं वहाँ पहलवानी की पहली शिक्षा शुद्ध शाकाहारी खान पान की होती हैं। 

आदित्य आगे कहते हैं कि मेरे जैसे पहलवान के लिये पहलवानी जिसे एक पूजा मान कर निभाते हैं व हम अपनी पूजा में मांस-मदीरा के सेवन कि सोच भी नहीं सकते। 

सभी पहलवानों ने एक राय में जाहिर किया कि पहलवानी कि शुरूवात ही बजरंगबली कि अराधना से प्रारंभ होती हैं लेकिन दंगल नें महावीर फोगाट जैसे हनुमान भक्त पहलवान को एक नास्तिक रूप से प्रकट कर पहलवानों कि भारतीय सभ्यता को दबाने का षडयंत्र किया है। 

सुरेश चव्हाण ने आमीर खान कृत दंगल में मांसाहारी मानसिक को दिखाने व बजरंगबली कि भक्ती को फिल्म से अलग करने के पिछे दो षड्यंत्र कि संभावना व्यक्त की जिसमें पहली देश में मांस उद्योग का प्रचार व दुसरी फिल्म PK कि तरह मूर्ति पूजा का परहेज हैं। 

#SudarshanNews पर लगातार जारी दुसरे दिन भी बिंदास बोल में इस मुद्दे पर जोरदार बहस जारी रही किंतु #SureshChavhan (@chavhanke) के कडे प्रयत्नों का बावजूद ना ही आमीर खान या दंगल फिल्म से जुडे किसी ने भी अबतक कोई अपना पक्ष रखा। इससे जाहिर होता हैं कि वे अपना मुँह छिपाते फिर रहे। 

Twitter: @SudarshanNewsTV 

तीन तलाक और हलाला

​तीन तलाक और हलाला

जैसे ही लाॅ कमीशन ने UNIFORM CIVIL CODE के लिए पहल करते हुवे जनता कि राय क्या मांगी, मिडिया ने अपनी बहस को केवल तीन तलाक पर केंद्रित कर दिया।

हालांकि UNIFORM CIVIL CODE में तलाक सिर्फ यही एक मुद्दा नहीं हैं इसमें और भी कई मुद्दे हैं लेकिन मिडिया ने केवल तलाक को इसलिए प्रचारित किया क्योंकि वे जानते हैं कि देश के मुस्लिम वर्ग में बैठे धर्म के ठेकेदारों के लिए यह एक दुखती नस हैं। यदि इस मुद्दे के जरिए उन्हें उकसाया गया तो वे चुप नहीं बैठेंगे। यहाँ तक की वे मार-काट पर भी उतर सकते हैं और यही बात उन्होंने मिडिया के समक्ष जाहिर भी कर दी। UCC का विरोध वे मात्र एक ही आधार पर कर सकते हैं और वो है उनका धर्म क्यों कि शेष सभी तर्क उनके ही वर्ग के सामान्य सभी मुस्लिमों के लिए लाभकारी हैं जिससे उनकी बोलती ही बंद हो जाती हैं। लेकिन ये धर्म के ठेकेदार खुद के लाभ को ध्यान में रखते हुए UCC के विरोध में देशभर के मुस्लिम युवकों को भ्रमित करने को उतारू नजर आ रहा। 

इसे समझने के लिए यह समझना जरूरी हैं कि तीन तलाक का मुद्दा क्या हैं। जिस तरह लगभग अन्य सभी समुदायों में तलाक का एकमात्र जरिया अदालत का दरवाजा हैं वहीं धर्म को आधार बनाकर मुस्लिम वर्ग ने कानूनी प्रक्रिया को नकारते हुवे खुद के लिए शरियत कानून कि आजादी हासिल कि हैं। जिसके अनुसार तीन-तलाक व हलाला प्रक्रिया लागु होती हैं। शरियत नियमानुसार क्या होना चाहिए यह बेहद अलग विषय हैं लेकिन इसकी आड़ में जो भी कुछ मुस्लिम समुदाय में प्रचलन चल रहा हैं वह ना तो मानवीय हैं और ना ही सभ्य कहलाने लायक हैं। तीन-तलाक कि प्रथा से सबसे बड़ी प्रताड़नाओ से यदि किसी को गुजरना पड़ रहा तो वह हैं मुस्लिम समुदाय कि महिलाएं। 

तीन-तलाक कि प्रकिया 

— यदि शौहर ने अपनी बेगम को तीन दफा तलाक-तलाक-तलाक कह दिया या मात्र जाहिर भी कर दिया तो तलाक मान लिया जाता हैं। 

— ना ही कोई लिखा पढ़ी और ना ही कोई अतिरिक्त प्रक्रिया और ना ही पत्नी कि रजामंदी बस पति-पत्नी के मध्य रिश्ता खत्म। 

— पती ने पत्नी के भविष्य निर्धारित करने वाले यह तीन शब्द “तलाक” किस अवस्था में या जरिए से कहे वह कोई मायने नहीं रखते। 

— फिर चाहे वह आपसी झगड़े के चलते पति गुस्से में हो या शराब के नशे में हो, पत्नी सामने हो या दुर मायके में हो, जरिया चाहे फोन हो, SMS हो या फिर फेसबुक अथवा ट्विटर ही क्यों ना हो…. यह सब जायज माना जायेगा व इसके बाद तो पति-पत्नी चाहे तो भी वे इसे नहीं बदल सकते। 

— पति अपनी छोड़ी गई पत्नी व जितने भी बच्चे हो, उनकी जिम्मेदारी पूरी तरह मुक्त हो जाता हैं व किसी भी रूप से उनके आर्थिक सहायता के लिए बाध्य नहीं रहता। 

— पत्नी को ताउम्र ना केवल स्वयं के बल्कि उन बच्चों के पालन पोषण के बोझ झेलने के लिए छोड़ दिया जाता हैं। 

यह अपरिवर्तित हैं व पति-पत्नी दोनों के लिए बाध्य हैं क्योंकि इन तीन शब्दो के बाद पति-पत्नी के मध्य इनके धार्मिक ठेकेदार धर्म का नाम लेकर ऐसी दिवार बनकर खड़े हो जाते हैं कि उनके आगे किसी की नहीं चल सकती। 

यहाँ तक कि स्थिति तो स्त्रियों के लिए नर्क जैसी ही हैं लेकिन उससे भी बड़ी जिल्लत का सामना उन्हें तब करना पड़ता हैं जब यदि वही पति उसे फिर अपनाना चाहें। लेकिन अब ऐसा तब तक संभव नहीं जब तक धर्म के ठेकेदार हटते नहीं। इन धर्म के ठेकेदारों के अनुसार एक तलाकशुदा पति अपनी पहली पत्नी को फिर से मात्र तभी अपना सकता हैं जब उसकी पत्नी हलाला प्रक्रिया से गुजरे और इनके ही अनुसार यह शरियत के मुताबिक हैं। और यहीं से दुकानदारी व अय्याशी शुरू होती हैं इन धर्म के ठेकेदारों कि। हलाला! क्यूँ कि जब शरियत अनुसार ही निकाह व तलाक हुवा हैं तो तलाक उपरांत पति-पत्नी के मध्य जो संबंध खत्म हुवे या किये गये हैं उसे पुन: स्थापित करने के के लिए जो प्रकिया अपनाई जाती हैं उसका ही नाम हैं हलाला। 

क्या है हलाला पक्रिया 

— इन धार्मिक ठेकेदार के अनुसार एक तलाकशुदा पति अपनी पूर्व पत्नी को अपनाये उससे पहले पत्नी को किसी और गैर-मर्द से निकाह करना होगा
— उस पत्नी को नये पति के साथ एक रात हमबिस्तर भी होना होगा

— ऐसी एक रात के बाद नये पति द्वारा उस पत्नी को तलाक देना होगा लेकिन इस तलाक के पहले तब तक इंतजार करना होगा जब तक कि पत्नी का एक मासिक धर्म ना बिते और यदी ऐसा ना हुवा तो तलाक भी नहीं हो पायेगा। 

— इस दुसरे तलाक के बाद पहला पति अपनी पूर्व पत्नी से फिर से निकाह कर सकता हैं। 

जाहिर हैं कि इस तलाक व हलाला की प्रक्रिया में औरत को मात्र एक खिलौना मान कर चला जाता हैं। यदि एक पति ने गलती से भी तीन तलाक कह दिया तो उसका खामियाजा उसे नहीं भुगतना बल्कि सारी आफते मात्र पत्नी को ही झेलना हैं। 

तलाक जैसी प्रक्रिया का इतना लचीला होने की वजह से ही देश में सबसे बड़ी तादाद तलाक कि मात्र मुस्लिम समुदाय को ही समर्पित हैं। लाखों छोड़ी गई महिलाएं खुद का व बच्चों के भार उठाने को मजबूर हैं। जहाँ ऐसी प्रथा धार्मिक ठेकेदारों के लिए कमाई व अय्याशी का श्रोत बनी हुई हैं वहीं ना केवल पुरे मुस्लिम समुदाय को अधर में धकेल रही बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए बेरोजगारी, अशिक्षा, गरीबी व जनसंख्या अनुपात हिलाने जैसी समस्याएं फैलाकर खतरनाक सिद्ध हो चुकी हैं। 

आवाज उठाये ऐसी प्रथा को खत्म करने के लिए, यही मौका हैं।

​जनता का राज… क्या सुना था कभी!

​जनता का राज… क्या सुना था कभी!

🚩 पहले झटके में लोगों ने दो फिल्में क्या फ्लाप कि शाहरुख खान के दिमाग से असहिष्णुता का भूत उतर गया, हर जगह सहिष्णुता नजर आने लगी। और दुसरे झटके में खुद कि फिल्म से पाकिस्तानी अदाकारा को बाहर निकालना पड़ा। यह पुरी तरह से जनता कि भावनाओं के आगे घुटने टेकने जैसा बड़ा फैसला था। 
🚩 अमीर खान को स्नेपडील व भारतीय पर्यटन के विज्ञापनों से लोगों के दबाव में लात क्या पड़ी अब उनकी दुसरे नंबर कि बीवी को देश में डर लगना ही बंद हो गया। 
🚩 ये लोगों उमड़ता गुस्सा हैं… जिसने करण जौहर को भी एहसास कराया कि सिर्फ उसकी दुनिया ही सबकुछ नहीं हैं और सामान्य लोगों के बिना उसकी कोई औकात नहीं। 

🚩 भारत के टुकड़ों पर पले ओमपुरी ने जिस तरह भारतीय सेना का अपमान किया उसके बाद लोगों ने जो उसकी रही-सही इज्जत की ऐसी धज्जियाँ उड़ाई कि सिधे अब वह नाक रगड़ते हुवे बलिदानी सैनिक के परिवार से मिलने पहुंच गया।

🚩 जनता के ही कारण जो समाचार चैनल कल तक खुद को ‘देश का नंबर एक समाचार चैनल‘ बताने का दावा सुबह-शाम ठोका करता था और वे बिकाऊ पत्रकार जिन्होंने स्वयं को देश के पत्रकार-जगत का पिलर मान बैठे थे, आज अपनी विश्वसनीयता ही खो बैठे हैं। वह जनता ही हैं जिसने एसे भ्रष्ट राजनैतिक दल जिसने सर्वाधिक देश पर राज किया, उसे आज अपने अस्तित्व बचाने को संघर्षरत स्थिति में ला कर खड़ा कर दिया। 

🚩 यह इस बात का सिधा प्रमाण हैं कि अपनी ऐशो-अय्याशी में डूबे ऐसे भांड कलाकारों, बुद्धिजीवियों , पत्रकारों और नेताओं ने ना तो जनता कि भावनाओं को कभी कोई महत्व दिया और ना ही आज भी सहजता से महत्व देना स्वीकार कर पा रहे। 

👆बेहद सरल शब्दों में यदि कहे तो जिसकी रग-रग में भारतीयता हैं वह आज “अच्छे-दिन” का सुखद अनुभव कर रहा….

— जो जनता कि भावनाओं के साथ स्वयं को जितना जल्दी ढाल रहा, वही समझदार नजर आ रहा हैं…. 

— जो ठोकर खा कर फिर स्वयं को ढालने कि कोशिश कर रहा, उसकी मूर्खता उभर रही…. 

— और जो ठोकर खाकर भी ऐठ रहा, वह तो अपने धूर्त होने का परिचय दे रहा। 

ऐसा इसलिए क्योंकि मुर्ख लोकतंत्र को समझ नहीं पा रहे तथा धूर्त से अपनी अय्याशी छुट ही नहीं सकती। लेकिन सच्चाई तो यह हैं कि यही भारत का वास्तविक लोकतंत्र हैं। “लोकतंत्र में जनता का राज” … अब तक सिर्फ किताबों में पढ़ते आये थे, आज वही वास्तविक स्वरूप हैं और ध्यान देना… _अभी तो यह शुरूवात हैं!_

कुछ ऐसे लोग भी हैं जो अब भी यही गुमान में हैं कि यह तो मात्र “संघीयों” का षड्यंत्र हैं …. तो उनके लिए सुझाव हैं कि अब वे संपूर्ण राष्ट्र को ही एक “संघी” मानकर चले… 

…. क्योंकि मेरा देश अब वाकई बदल रहा हैं।

|| वंदेमातरम् || 🚩🚩🚩

A Guide To Fill UNIFORM CIVIL CODE Questionnaire As Requested by LAW COMMISSION OF INDIA

(Everyone is free to fill the form their own way. Here is only illustrator to fill the form to the strict sense for UNIFORM CIVIL CODE )

1) Are you aware that Article 44 of the Constitution of. India provides that “theState shall endeavour to secure for the citizens a Uniform Civil Code throughout the territory of India”?

Yes

In your view, does this matter require any further initiatives?

Yes, we don’t have uniform low for all

2) The various religious denominations are governed by personal laws and customary practices in India on matters of family law, should the UCC include all or some of these subjects — Marriage, Divorce, Adoption, Guardianship and Child custody, Maintenance, Successions, Inheritance ?

It should further include (mention in below box)

Please specify exclude / Include :

Family property matters

3) Do you agree that the existing personal laws and customary practices need codification and would benefit the people?

Personal laws and customary practices should be replaced by a uniform code

4) Will uniform civil code or codification of personal law and customary practices ensure gender equality?

Yes

5) Should the uniform civil code be optional?

No

6) Should the following practices be banned and regulated?

Polygamy

Regulated

Polyandry

Regulated

Similar customary practices such as Maitri-karaar (friendship deed) et al.

Banned

7) Should the practice of triple talaq be…

Abolished in toto.

8) Do you think that steps should be taken to ensure that Hindu women are better able to exercise their right to property, which is often bequeathed to sons under customary practices?

Legal provisions will not help in what is primarily a cultural practice, steps have to be taken so sensitise the society instead.

9) Do you agree that the two-year period of wait for finalising divorce violates Christian women’s right to equality?

Yes, it should he made uniform across all marriages

10) Do you agree that there should be a uniform age of consent for marriage across all personal laws and customary practices?

Yes.

11) Do you agree that all the religious denominations should have the common grounds for divorce?

Yes

12) Would uniform civil code aid in addressing the problem of denial of maintenance or insufficient maintenance to women upon divorce?

Yes

Give reasons:

As it would be forced by low

13) How can compulsory registration of marriages be implemented better?

A marriage certificate must made compulsory for everyone putting married status in important forms like PAN, ADHAAR or VOTER ID

14) What measures should we take to protect couples who enter into inter-religion and inter-caste marriages?

This is possible only through uniform civil code

15) Would uniform. civil code infringe an individual’s right to freedom of religion?

No

Give Reason:

Its more regulating rights of equality for men and women and much needed in a secular county like India

16) What measures should be taken to sensitize the society towards a common code or codification of personal law?

Should be routes through religious intellectuals, social groups and NGO who are pro to UNIFORM CIVIL CODE to educate their own people

Remarks:

Implementation of UCC is much awaiting reforms as specified in constitution.

(आप अपनी तरह से उत्तर देने के लिए स्वतंत्र हैं किंतु उपरोक्त तरह भरा गया जवाब UCC के लिए सख्त नियम कि मांग करता हैं)

जय हिंद 🇮🇳🚩

UNIFORM CIVIL CODE

महत्वपूर्ण सूचना

आज़ादी के 69 साल बाद देश मे सभी धर्मों के लोगों के लिए एक समान क़ानून बनाने की बात गंभीरता से उठी है| कृपया विधि आयोग (लॉ कमीशन )को अपना जवाब २० नवम्बर के पहले ज़रूर भेजें|

भारत में समान नागरिक संहिता की स्थापना और मुस्लिम महिलाओं के अधिकार रक्षण के लिए भारत सरकार के विधि आयोग (लॉ कमीशन) ने लोगों की राय जाननी चाही है और इसके लिए कमीशन ने 16 प्रश्न पूछे हैं| सभी धर्मावलंबिओं के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा मे जनता से मिले जवाब की काफ़ी अहम भूमिका हो सकती है। इसलिए हम सबको अपने अपने जवाबों को lci-dla@nic.in पर भेजना है।

आसानी से भेजे अपनी राय:
कृपया निचे दी गई लिंक पर क्लिक कर १६ प्रश्नों के जवाब आसानी से दे कर फॉर्म सबमिट करे । प्रश्न व आपके उत्तर से भरा एक ईमेल आपको आपके ईमेल पर मिलेगा जिसे आप फॉरवर्ड  lci-dla@nic.in इस ईमेल पर कर दे।

फॉर्म की लिंक: https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSdKyazpiXnlfu64sFsRCyGXTjMDtFRrwPIHHfWJJnGN7WYm-g/viewform?c=0&w=1

सरकार अपने सामान-नागरिक-अधिकार का वादा पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ा रही हैं लेकिन बगैर हमारे सहयोग के यह संभव नहीं । ध्यान रहे विरोधी इसके खिलाफ ज्यादा से ज्यादा फॉर्म भर रहे हैं , कृपया आप देर ना करे ।

सर्जिकल स्ट्राइक और देश के गद्दार

​सर्जिकल स्ट्राइक भले ही पाकिस्तान में हुई हो लेकिन उसका बड़ा असर भारत में नजर आ रहा…. 

बॉलिवुड, राजनितिक व पत्रकार जगत में देश के सारे छिपे हुए फर्जी महारथियों नें अपने पाक-परस्त दामन से शराफत का चोला उतार लिया हैं… अब तक ये बहुरूपियों कि भाँती दुश्मन पाक से यारी निभाये जा रहे थे….और देश के युवा इन्हें अपना आदर्श समझ बैठे थे !!!! इन्हें पहचाने…  इन्हें भूलीये मत… सिमा पर सेना युद्ध बाद में लड़ेगी…! आंतरिक युद्ध तो अभी ही प्रारंभ हो चुका… इन गद्दार पाक-परस्तों के साथ!!! … और यह आंतरिक युद्ध जनता को लड़ना हैं, हम सब को मिल कर लड़ना हैं!!! 

आज वक्त हैं जब आम जनता को समझना होगा की… 

> हमारे वास्तविक “हीरो” कोन हैं?

… फ़िल्मी पर्दो पर या सिमा पर!

> हमारे वास्तविक “नेता” कोन हैं?

… सेकुलरिज्म पूजने वाले या भारत माता को पूजने वाले!

> हमें वास्तव में सतर्क कोन रख सकता हैं?

… वामपंथी विचार लिए विदेशी पूंजी पर पलने वाले पत्रकार या देशी मिटटी से जुड़े पत्रकार!

जंग जितने के लिए हमे जानना जरुरी… हमारी जागरूकता ही इस जंग में हमारा सबसे बडा हथियार हैं!

आज जो इस सच्चाई को जान चूका हैं वही…मूर्खता ना करने वाला ज्ञानी हैं…निर्लज्जता त्यागने वाला स्वाभिमानी… और वही ऐसे युद्ध के वास्तविक योद्धा कि महत्वपूर्ण निशानी हैं। 

।। जय हिंद। जय भारत।।