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वसुंधरा मुक्त राजस्थान (कविता) 

​समय रहते चेत उठो ओ बिजेपी के ठेकेदारों 

ना समझना के जनता तो बस यूँही रूठ जाती हैं

#उपचुनाव से सुन लो पुकार बस यही आती हैं 

वसुंधरा राजे गद्दी पर, “जरा” नहीं सुहाती हैं… 
कैसे मेडम नें बेरोजगारी का तांडव मचा रखा हैं

क्यों हिंदु रक्षा में उनकी सारी नितिया हुई पस्त

सत्ता के मद में हुवे सेकडो महारथी ध्वस्त 

गर अब ना जागे तो फिर आगे, मजा चखोगे “मस्त” 
सिर्फ “मोदी” नाम से हर बार ना संभल पाओगे 

“केंद्र” कि सफलता को क्या “राज्य” में गिनवाओगे! 

“मुख्यमंत्री” का दम अब बना मात्र खोखला हैं… 

बुझाता दिया फडक रहा, कैसे उजियारा फैलाओगे! 
कम शब्दों में समझो इतना, 

सोच समझ कर फैसला करना

वक्त गया अब बहुरूपियों का

बोलवचन अब बना हैं सपना
बलिदानी राजस्थान को

स्वीकार ना होगा कोई मद-सत्ता “भोगी” 

कण-कण मिट्टी जिसकी “हल्दी” 

मांग रहा फिर तुमसे एक कर्मठ “योगी”

~ संजय त्रिवेदी, हल्दीघाटी 

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सत्य कि राह (कविता) 

सुनने की आदत डालो क्योंकि 
ताने मारने वालों की कमी नहीं हैं।

मुस्कराने की आदत डालो क्योंकि
रुलाने वालों की कमी नहीं हैं।

ऊपर उठने की आदत डालो क्योंकि
टांग खींचने वालों की कमी नहीं है।

प्रोत्साहित करने की आदत डालो क्योंकि
हतोत्साहित करने वालों की कमी नहीं है!!

छोटी छोटी बातें दिल में रखने से
बड़े बड़े रिश्ते कमजोर हो जाते हैं

और बड़ी-बड़ी बातो को भुला देने से
दुश्मन भी अपने हो जाते हैं

जिवन वही जो दूसरों का जिवन बदल डालें
स्वप्न में जीने वालों में सत्य सहने का साहस डालें

कभी पीठ पीछे आपकी बात चले
तो घबराना मत …
बात तो “उन्हीं की होती है”
जिनमें कोई तो ” बात ” होती हैं…

क्युँ की सच्चा व्यक्ति ना तो नास्तिक होता है
ना ही आस्तिक होता हैं।
सच्चा व्यक्ति हर समय केवल वास्तविक होता है…..

“निंदा” उसी की होती हैं जो”जिंदा” हैँ
मरने के बाद तो सिर्फ “तारीफ” होती हैं…

——- ध्यान रखना – – – – – – –

सत्य भी केवल तब तक सत्य रह सकता हैं
जब तक उसका साथ देने वाले जिंदा हैं…

मौत से भी पहले वे मर जाते हैं जिनमें
सत्य का साथ देने का सामर्थ्य खत्म हो जाता हैं…

।। वंदेमातरम् ।।

(संकलित व संपादित कविता)

दादरी v/s मालदा (कविता) 

#### दादरी v/s मालदा #####

एक तरफ “दादरी”, एक तरफ “मालदा”
एक में सिर्फ सेकडो थे तो एक में जमा हुवे थे लाखों
एक भडकाया गया था, एक “खुद-ब-खुद” भडक गया

एक में जो हत्या हुई थी वह था निर्दोष
एक में पीडीतो का ही नीकाला गया दोष

एक में मानवता हो गई थी शर्मशार
एक में धार्मीक भावना बनी आधार

एक में “हिंदुऔ” ने मचाया था कोहराम
एक में “असमाजीक” तत्वो का आया नाम

एक में हिंसक हुवे थे तुरंत बंदी
एक में अब तक खोज रहे हुडदंगी

एक पर मिडीया में ब्रेकिंग पर ब्रेकिंग न्युज
एक पर सारे मिडीया एक साथ फ्युज

एक पर सारे सेक्युलर नेताऔ को खुली मीली थी छुट
एक पर गलती से भी कोई जो पहोंचे…तो मौके कि “लुट”

एक पर देश का सेक्युलरीज्म लग गया था फटना
एक पर यह रह गई बनकर मात्र एक “स्थानीय” घटना

एक पर असहिष्णुता बना दी गई थी राष्ट्रीय आपदा
एक कि खबर अब भी तरस रही बनने को मुद्दा

एक पर पुरी गैंग ने अवार्ड वापसी को बनाया था हथीयार
एक के लिये आवाज उठाने को कोई नहीं हो रहा तयार

एक पर क्या शाहरूख! क्या आमीर!
सबके दिख गये थे “आँसु”
एक पर ये अपनी कला दिखाकर
छिपाते फिर रहे हैं “मुँह”!

एक से अल्पसंख्यक पड गये थे खतरे में
एक पर भला क्यों कोई पडे इस सदमें में

एक में लुटा दिये थे प्रसाशन नें रूपये मात्र ३४ लाख
एक पर अब भी जख्मी तलाश रहे न्याय की साख

कोई यह ना मान बैठे कि जो हुवा वह नसीब था
फर्क तो दोनो में होना बडा ही वाजीब था

एक तरफ देशभर में संगठीत सेक्युलर वोटबँक का सवाल था
और दुसरी तरफ….
आपस में ही लडने वाला,
धर्म को खिलौना समझने वाला,
राजनीती को गंदगी मानने वाला,
खुदगर्ज, नींद में डुबे रहने वालो का हाल था!!!

— दोनो घटना से व्यथीत —
— भविष्य के लिये चिंतीत —
— फिर भी तत्पर, सतर्क और कार्यरत —
— एक हिंदु राष्ट्रवादी —

|| वंदेमातरम् ||

क्या लखनऊ, क्या वाराणसी (कवीता)

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क्या लखनऊ, क्या वाराणसी
जब साथ खडा हर भारतवासी
हर आँखो में अब अरमान जगा हैं
रही ना दुसरी कोई आस बाकी

सौ-सौ कजरी-राहुल हाथ मिलाले
नमो सुनामी को रोक नहीं पायेंगे
जीत के आयेंगे दम पर अपने
देश के कोने-कोने में नमो छा जायेंगे

बीजेपी के नाम पर खडा कर दो जीसे भी
अब किसी को क्या फरक पड जायेगा
क्युँ की बटन कमल का दबाते वक्त भी
हमें तो चेहरा सिर्फ नमो का नजर आयेगा

— संजय त्रिवेदी

अब ये नशा ना छुट पायेगा ( कवीता )

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अब ये नशा ना छुट पायेगा ( कवीता )

नशा अगर सिगरेट का होता
तो गर्लफ्रेंड के लिये छोड देता…

नशा अगर शराब का होता
तो फेमिली के लिये छोड देता…

नशा अगर चरस-गांजे का होता
तो जीने की तमन्ना के लिये छोड देता….

नशा लगा भी तो लगा देशभक्ति का
ना छुटते बनता, ना छोडा जायेगा…

दुश्मनों का जनाजा तो उठना ही हैं एक रोज
मैं ना रहा तो मेरे बाद भी ये “नशा” क्रांति कि मशाल जलायेगा !!!

— संजय त्रिवेदी की रचना

जह हिंद, जय माँ भारती !!!

आजादी के संग्राम का अब तांडव मचाने आया हुँ (कविता)

अब तांडव मचाना हैं !!!

अब तांडव मचाना हैं !!!

आजादी के संग्राम  का अब तांडव मचाने आया हुँ।
खाली हाथ नहीं आया साथ कफन भी लाया हुँ।

मंद हवा थम चुकी अब तुफान आने को हैं
सब्र का बांध टुट चुका सैलाब आने को हैं
दिलदहला देने वाला मंजर खडा कर दूंगा
और इंतजार नहीं अब इंकलाब आने को हैँ।

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गलती ना कर बैठना साथियों (कविता)

Save Hindutva, Save Nation

Save Hindutva, Save Nation

गलती ना कर बैठना साथियों
अपना धर्म भुल जाने की|
वर्ना नोबत आ सकती हैं
माँ-बहनो की अस्मत लुटाने की|

ठोक सीना, दहाड के कहना
हा मैं हिंदू नहीं जरुरत घबराने की|
जब लड के ले सकता हुँ हक अपना
क्यों कोशीश करु गद्दारों को मनाने की|

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