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सुप्रीम कोर्ट और देशी त्योहार

गोविंदा पथको कि दमदार फेरी और विरोध
एक जज ने उडवाया पुरे सुप्रीम कोर्ट का मजाक

इस बार कि जन्माष्टमी पर्व पर गोविंदा ग्वालों ने जमकर धुमधाम के साथ उँची से उँची मटकी बेधड़क सीना तानकर फोडी और फोड़ते वक्त काले कपड़े दिखा कर न्यायपालिका को उसकी हद भी दिखाई।

आखिर क्यों वेलेंटाइन-डे जैसे विदेशी पर्व का बचाव करने वाली हमारी न्याय व्यवस्था देश के देशी पर्वो पर तुरंत सक्रिय हो जाती हैं, सवाल उठना वाजिब हैं।

इसका कारण भी मजबूत हैं, ऐसे विदेशी पर्वों पर जितनी भी सामग्री व सेवाएं बिकती हैं वे अधीकतर विदेशी या बड़ी कंपनियों, होटलों कि कमाई करवाती हैं और यह धंधा उनके लिये अरबो-खरबों कि कमाई का जरिया बनता हैं। अत: वे विदेशी प्रचलन के बचाव में पुरी तरह मुस्तैद रहते हैं व जिसके लिए वे अपनी कमाई का बंदरबांट भी करने को तैयार रहते हैं।

वहीं देशी त्योहारों में अधीकतर छोटे-छोटे कारीगरों व मजदूरों कि कमाई होती हैं जिसमें ना तो बंदरबांट का अवसर होता हैं और ना ही बचाव के लिए कोई बडी ताकत खड़ी मिलती हैं।

देशी त्योहारों को दबाने व विदेशी त्योहारों को उठाने के लिए वे विदेशी ताकते भी पुरी तरह सक्रिय रहती हैं जिनकी संपूर्ण कमाई ही देश में पनप रही विदेशी परंपराओं पर आधारित हैं व भारतीय संस्कृति जिनके लिए एक बड़ी रूकावट हैं।

भारतीय समाज कि आज सबसे बड़ी समस्या यह हैं भारतीय संस्कृति के विरोध में बडी से बडी ताकते तो लामबंद होकर जुटी हुई हैं लेकिन उसकी रक्षा हेतु हम अब तक बिखरे हुए हैं। यह भी एक सच्चाई हैं कि जब हमारा समाज एसे षड़यत्रों से अभी तक पूरी तरह अंजान हैं तो वे इनके विरोध में एकजुट होकर लड सके यह दुर की बात हैं। लेकिन इस बार एक सुर में गोविंदा पथकों द्वारा दिखाई एक जुटता नें भारतीय समाज के लिए शुभ संकेत दिए।

वह धर्म ही हैं जो हमें जोड़ सकता हैं : धर्मों रक्षति रक्षतिः

।। वंदेमातरम्।।

कांग्रेस और हिंदु-आतंकवाद का सच

भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों द्वारा इस खुलासे से कि समझौता ब्लास्ट मामले में पुरोहित व अन्यो के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं हैं, कांग्रेस के देशद्रोही चेहरे को एक बार फिर से उजागर कर दिया है।

UPA के समय में ही समझौता ब्लास्ट व मालेगांव ब्लास्ट के तुरंत बाद सौंपी गई NIA रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से हमले कि साजिश के तार पाकिस्तान व बंग्लादेश से जुडे होने कि बात कही गई थी लेकिन कांग्रेस सरकार के मंत्रियों ने उदे दर किनार कर हमले का दोष पुरी तरह से RSS व VHP के कार्यकर्ताओं के सिर लगाया।

इससे पूर्व भी इशरत के मामले में सोनिया सरकार के गृह मंत्री के झूठे शपथ पत्रों से यह सिद्ध हो चुका हैं कि वे आतंकियों को बचाने के लिए हिंदू नेताओ और संतो पर झूठे मामले दर्ज करते थे। कांग्रेस के मोदी के खिलाफ ‘झुठे एंकाऊंटर’ कि धज्जीया तब से उडनी शुरू हो गई थी जब से अमेरिका में कैद आतंकी डेविड हेडली ने इशरत को आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा कि आत्मघाती दल का हिस्सा बताया था।

भारत के खिलाफ रची गई एसी घीनोनी व राष्ट्रद्रोही हरकत के पीछे कांग्रेस के तीन लक्ष्य साफ तौर से उभरकर आते हैं…

पहला – RSS व VHP जैसी राष्ट्रवादी संगठनों कि साख को धुमील करना जिससे वे आम जनता के लिये अपेक्षीत बने रहे।

दुुसरा – इस तरह से वे पूरे भारत में सांप्रदायिक कट्टरता को बढावा देने कि कोशिश में लगे थे जिससे अल्पसंख्यक वोट बैंक डर कर उनके पक्ष में खडा रहे।

तीसरा – विश्व स्तर पर हिंदू-आतंकवाद को मुद्दा बनाकर पुरे विश्व में भारत को बदनाम करना जिससे भारत कि पहचान भी आतंक समर्थित देशों मे होने लगे जिसमें सिधा फायदा पाकिस्तान का था जो कश्मीर मुद्दे पर त्रिपक्षीय वार्ता कि मंशा को पुरा कर सकता था।

इस संबंध के कुछ ध्यान देने वाले तथ्य….

समझौता ब्लास्ट में जहाँ कर्नल पुरोहित व चार अन्य पिछले 9 साल से जेल में बंद हैं वहीं मालेगांव ब्लास्ट में साध्वी प्रज्ञा सिंह सहित अन्य सात-सालों से जेल में बंद हैं। यहाँ तक कि जेल में ही साध्वी प्रज्ञा कैंसर से भी ग्रसित हो चुकी हैं लेकिन अदालतों से जमानत भी नामंजूर ही कि गई। यह जान कर और भी हैरत होगा कि अब तक सबूत के अभाव में इनके खिलाफ एक भी चार्जशीट तक दाखिल ना हो सकी। इसी तरह इशरत जहां केस में बंजारा जैसे अधिकारी जिनको पुरस्कृत किया जाना चाहिए था उन्हे भी चार साल जेल में बंद कर रखा गया।

इन सबकी गलती मात्र इतनी ही थी कि ये राष्ट्रवादी संगठनों से जुडे थे, देश के लिये कार्यरत थे व हिंदु समुदाय से थे।

पहले सिमी जैसे देशद्रोही संगठनो को समर्थन और उसके बाद बिना सबूतों के हिन्दू आतंकवाद शब्द को गढ़ना, यह बताता है  कि सोनिया गाँधी  सत्ता प्राप्त करने के लिए किसी भी सीमा तक जाकर देश को नुकसान पंहुचा सकती है। सोनिया ने न केवल आतंकियों के हौंसले बढ़ाये हैं अपितु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का मजाक बनवाया है। इन्होने झूठे मामलों में हिन्दुओ को फंसाकर अल कायदा के सहायक बनकर असली आतंकियों को छोड़ने का अपराध भी किया है।

कांग्रेस के इस षडयंत्र में फँस कर मैकाले कि शिक्षा से शिक्षित एक वर्ग व इनके साथ बिकाऊ मिडिया RSS व VHP कि तुलना आतंकी संगठनों से करने को तुली रहती हैं। आज यह वर्ग व विदेशी मिडिया देश व संस्कृति के लिये आवाज उठाने वाले हर शख्स को एक संघी का ठप्पा लगाकर पेश करता आया हैं।

देश की सुरक्षा से जुड़े इन अति संवेदनशील मामलों में कांग्रेस की यह कार्यवाही एक अपराधिक षड़यंत्र है। इन अपराधों के लिये सोनिया -राहुल पर राष्ट्रद्रोह का केस बनता हैं। एसे षडयंत्रों के लिए जनता की जागरूकता ही एक मात्र उत्तर बन सकती हैं।

|| जय हिंद ||

#WCFIndiasPride : Will Fight Back !

#WCFIndiasPride : Will Fight Back !

भारत में भारतीय संस्कृती को मिटाने वाली ताकतों ने अब आर्ट-आफ-लीवींग को नीशाना बनाया| दिल्ली में यमुना नदी के किनारे होने वाले आर्ट-आफ-लिवींग के अतंराष्ट्रीय सांस्कृतीक सम्मेलन जो कि यमुना नदी के किनारे ११ से १३ मार्च ११ से १३ मार्च को निर्धारीत हैं उसके पाछे तरह-तरह के विहाद फैलाया|

ये वही ताकते हैं जिन्होने कई तरीकों से हमारे पुज्य साधु-संतो के खिलाफ तरह-तरह के षडयंत्र रचते आ रहे हैं और जिस तरह साधु-संतो के पीछे बिकाऊ मिडीया भी अपनी एडीचोटी का जोर लगाती आया हैं उसी तरह इस बार भी मिडीया व बिकाऊ पत्रकार का एक वर्ग ने अपना बजार लगाने कमर कस था|

पर्यावरण के रक्षक उस समय कहाँ मर जाते हैं जब यमुना तट पर बडी-बडी बिल्डींगे निर्माण होती रहती हैं…मात्र तीन दिवसीय सांस्कृतीक कार्यक्रम में रौडे अटकाने के लिये सारा पर्यावरण प्रेम उमड पडा!!!

कुछ ही दिनो पहले पाकिस्तानी गायक गुलाम अली के कार्यक्रम का जब विरोध उठा था तब सारे विपक्ष व बिकाऊ मिडीया ने एक सुर में उसका साथ दिया था लेकिन भारत में ही भारतीय सांस्कृतीक कार्यक्रम के पक्ष में किसी ने आवाज बुलंद नहीं की!!!

यह एक सांस्कृतीक आतंकवाद का ही हिस्सा हैं जिसमें भारतीय संस्कृती को दबा कर खत्म करने का षडयंत्र चल रहा हैं जिसके तहत ही हमारी संत परमपरा पर रह-रह कर हमले होते रहे हैं|

हमे यह ठान कर चलना हैं कि इन मक्कारों कि चलने नहीं दि जायेगी… देश के हर राष्ट्रप्रेमी दिवार बन कर इनके विरोध में खडा नजर आयेगा

|| वंदेमातरम् ||

तोडने की साजीश

जरा सोचिये…

अखलाक (दादरी) के बहाने …!
हमें साम्प्रदायिक बनाया

रोहित (हेदराबाद) के बहाने ….!
हमें जातिवादी बताया

अब तृप्ती देसाई (शनि शिगणांपुर) के बहाने ..
हमें स्त्रीयों पर पाबंदी लगाने वाला
पुरूष प्रधान समाज साबीत किया जा रहा है…

चारों तरफ से घेरा जा रहा है..
हमें टुकडों में तोडा जा रहा हैं…
उकसाया जा रहा हैं ताकी हम अपनी सहनशीलता
को त्याग हिंसा पर उतर आये…

और यदी किसी ने उकसावे में प्रतीकार कर दिया तो फिर उससे प्रमाणीत किया जायेगा की भारत “असहनशील” हो गया हैं!!!

समजो इन विदेशी हाथो कि कठपुतली, इन सेक्युलर मक्कारो और मिडीयाई गद्दारों द्वारा फैलाई जा रही साजीशो को…

इस देश कि अखंडता तब तक सुरक्षीत नहीं जब तक देश का हिंदु जागृत व एकझुट नहीं!!!

विशेष:
” हिंदु ” कोई धर्म नहीं बल्की भारतीय जीवन शैली का नाम हैं| इस देश की मिट्टी में जन्मा हर शक्स जो भारतीय मिट्टी में पनपे विभीन्न धर्मों का अनुयायी हो अथया मानता हो कि उसके पुर्वज उनसे जुडे हुवे थे या वह जो भारतीय संस्कृती व सभ्यता से जुड कर खुद को भाग्यशाली मानता हो, वह एक “हिंदु” ही हैं|

हिंदु = जेन + सिख + बोद्ध + सनातन
(सभी धर्म जो देश कि ही मिट्टी में पनपे)

|| जागो और जगाऔ, देश बचाऔ ||

……..जन-जन को इसे भेजो…….

हिंदु विरोधी मिडीया का ताजा वार | शनि शिगणांपुर विवाद

आज कल बीकाऊ मिडीया शनि शिगणांपुर में स्त्रीयों के प्रवेश को लेकर बडी-बडी बहसो पर उतर आया हैं| यह वही भाडे के टट्टुवे पत्रकार हैं जो हिंदु-विरोधी रायता फैलाने की सुपारी उठा रखे हैं|

इन्हे मुद्दा नहीं भी मिले तो ये मुद्दा पैदा करने में माहीर हैं| तृप्ती देसाई नाम की महीला जिसने शनीशिंगापुर में महिलाऔ के प्रवेश पर हंगामा मचा रखा हैं वह पहले अन्ना और कांग्रेसी मंत्रीयों के साथ कई बार नजर आ चुकी हैं| जाहीर हैं, यह मुद्दा सुनीयोजीत तरीके से बनाया गया हैं| वास्तव में इस मुद्दे का धरातल हैं ही नहीं क्युँ की धार्मीक महीला स्वयं से ही शनीदेवता के दुर से ही दर्शन करेगी किंतु चंडाल चौकडी जिन्हे केवल बहस खडी करनी हैं वे किसी भी हद तक जा सकते हैं| तृप्ती देसाई – इस चंडाल चौकडी का तरोताजा उदाहरण हैं|

पहले भी मंदीरो में लडकीयों के जिन्स ना पहनने वाले जैसे बयानों के विरोध में हमारी मिडीया चेनलों की लम्बी-लम्बी बहसे तो जरूर ही सुनी होगी| इनबहसों में बयान देने वाले को संकुचीत सोच वाला व महीलाऔ के प्रती अव्यवहारी सोच वाला बताने कि हर पत्रकार कि होड सी लग जाती हैं| क्या किसी पत्रकार ने इस पहलु से इस पर बहस करने कि कोशिश कभी की हैं कि मंदिर में शालीनता व सादगी बनाये रखने कि दृष्टी से सही भी हो सकता हैं!!!

अब कुछ ही समय पहले कि इस खबर पर भी गौर किजीये….

मुंबई शहर कि विख्यात दरगाह हजीहली में वहाँ के ठेकेदारों ने स्त्रीयों के प्रवेश पर पुरी तरह से रोक लगा रखी हैं| इस खबर पर हमारे मिडीयाँ जगत को अब तक साँप सुँघा हैं|

इतना सन्नाटा पसरा हैं कि अभी तक मुंबई के लोग भी इस खबर से पुरी तरह वाकिफ ना हो सके हैं| कई मुस्लीम जोडे दरगाह तक साथ जाकर पुरूष वर्ग स्त्री को वहीं अकेले छोड कर अंदर जाना पड रहा हैं| किसी पत्रकार में हिम्मत हि नहीं हो सकी के वे इस मुद्दे पर बहस कर सके|

इनके समुदाय में इन कट्टर पंथीयों द्वारा जबरन थोपी गई बुर्का प्रथा पर पहले ही मिडीया जगत ने मोन धारण कर रखा था और स्त्रीयों के प्रती किये गये इस अव्यवहारीक प्रतीबंध पर भी ये पुरी तरह खामोश हैं|

एसे सेकडो उदाहरण भरे पडे हैं जब विदेशी पैसा पर पलने वाला मिडीया हिंदु धर्म के विरोध में खुलकर भौकता हैं लेकिन जब विदेशी धर्मो की बात आती हैं तो चुप्पी साध लेता हैं…

उदाहरणतया…
— साधु-संतो पर लगे आरोपों पर हफ्तो बहस करना किंतु विदेशी धर्मगुरूऔ के अपराधो पर खामोशी
— संतो के बयानो को ‘विवादीक’ बताना और विदेशी धर्मगुरूऔ के फरमानो व फतवों पर मौन
— हिंदु धर्म की विज्ञान प्रमाणीत मान्यताऔ को भी अंधविश्वास कि श्रेणी में खडा कर देना किंतु विदेशी धर्मो के निराधार व अंधविश्वासी प्रचलन को नजर अंदाज करना

|| जागो हिंदु, जागो ||

हैदराबाद : “आत्महत्या” कि सियासत और दलीत कार्ड

हैदराबाद : “आत्महत्या” कि सियासत

जानीये हकिकत:

* हेदराबाद युनीवरसीटी में दो विद्यार्थी समुह ABVP व ASA (Ambedkar Student Association) में तनाव पहले से चल रहा था
* विवाद का कारण ASA के सदस्यो द्वारा फैलाये जा रहे राष्ट्र विरोधी विचार थे
* रोहीत वामुले, जीसने आत्महत्या की वह भी ASA का ही सदस्य था
* ASA के विद्यार्थीयों ने “गौमांस की पार्टी” व “आतंकी याकुब मेनन” की फाँसी का विरोध – जैसे प्रदर्शनों में बढ-चढ कर हिस्सा लिया था जिसका ABVP ने जम कर विरोध किया
* रोहीत वामुले का एक विडीयो भी सामने आया हैं जिसमें वह साफ कहते नजर आ रहा हैं कि उसे हिंदु, हिंदुत्व व संघ के भगवा रंग से सख्त नफरत हैं
* ABVP के इस विरोध से खिसीयाए ASA के कुछ लोगों ने ABVP के एक विद्यार्थी पर जान लेवा हमला किया था
* ASA कि बढती गुंडागर्दी पर जब वहाँ के MLA ने आवाज उठाई तब युनीवर्सीटी के कुलपती ने एक जाँच समीती से जाँच करवाई
* जिसके बाद ASA के गुडों जैसी हरकत करने वाले छात्रों को कुछ समय के लिये युनीवर्सीटी के केंपस में घुसने की पाबंदी लगा दी थी
* ना तो ASA के इन छात्रो पर कोई कानुनी कार्यवाही की गई थी और ना ही इन्हे पढाई से रोका गया था
* रोहीत वामुले इनमे से ही एक था जिसने आत्महत्या कर लीया
* रोहीत ने अपने पत्र में मौत का कोई स्पष्ट कारण नहीं लीखा और इसके लिये ना ही अपने दोस्तो व ना ही अपने विरोधीयो को जिम्मेदार बनाने की अपील की
* पत्र में एक और मुख्य संदेश था जिसमें उसने ASA, जिससे वह जुडा था, उससे माफी मांगी और यह भी बताने कि कोशीश कि की – हमारे अपनो में कुछ गलत लोगों शामील हो चुके हैं

जीस तरह बीकाऊ मिडीया व सेक्युलर छाप नेता इस मुद्दे पर “दलीत” नाम का ठप्पा लगाने पर उतारू हुवे हैं तो यह भी जानना जरूरी हैं की…
– जहाँ मरने वाला दलीत वर्ग का था तो उन्होने जीस विद्यार्थी पर हमला किया वह भी एक दलीत ही था
– युनीवर्सीटी की जिस जाँच समीती ने इनके द्वारा किये गये हमले की जाँच की व इन्हे दोषी पाया उसमें भी दलीत सदस्य थे

इस मुद्दे कि असली वजह यदी मृतक के अंतीम पत्र से खोजने की कोशिश कि जाये तो आत्महत्या का कारण उसकी नीजी जिंदगी से हैं| मृतक ने अपील भी कि थी की उसकी मौत को आम दुनीया से ना जोडा जाये इस आधार पर भी मचा सियासी बवाल पुरी तरह से मृतक की आत्मा को अशांत ही करेगा|

“दादरी” कांड के बाद सोये हुवे सारे सेक्युलर छाप नेता अब अचानक से “दलीत” के नाम पर विद्यार्थी कि आत्महत्या पर जाग उठे हैं| इन्हे दादरी व हेदराबाद की घटना के बीच दो अन्य घटना मालदा और पुनीया से कुछ लेना देना नहीं था क्योंकी यह दो घटना ना मुस्लीम और ना ही दलीत वोट बँक को प्रभावीत करती थी|

विशेष:

विदेशी ताकतों ने कुछ लोगों को मायाजाल में फँसाकर एसे NGO खडे करवाये हैं जो माननीय डा. भीमराव आंबेडकर के नाम का इस्तेमाल करते हैं और “दलीत” वर्ग को उनके उत्थान का जाँसा देकर दलीत वर्ग में “हिंदु” विरोधी मानसीकता को बढावा देते हैं| एसे संघठनो द्वारा गौमांस का समर्थन व याकुब जैसे आतंकी की फाँसी का विरोध जिता जागता प्रमाण हैं| दलीत वर्ग के लोगों को एसी साजीशों से सतर्क रहने की जरूरत हैं|

|| वंदेमातरम् ||

बाजीराव “मस्तानी” नहीं पेशवा ही रहेंगे

“बाजीराव पेशवा” कि पहचान बना दी “मस्तानी” !!!

विदेशी हाथो कि कठपुतीयों जैसे फिल्म निर्माता आज हमे चुन-चुन कर हमारे गौरवशाली इतिहास से एसे फर्जी किस्सो को तोड-मरोड कर दिखाना चाहते हैं जिसमें हिंदु-समाज कि कट्टरता को उभारकर बताया जा सके जैसा कि “बाजीराव-मस्तानी”, “जोधा-अकबर” में दिखाया गया जिसे देख कर आज का आम भारतीय फिर अपनी संस्कृती के रक्षक पुर्वकालीन समाज को कोसने लग जाये और सोचने लगे कि धर्म के नाम पर एसा भेदभाव क्युँ हुवा!!! आज का आम भारतीय, जिसे वास्तवीक इतिहास का कोई ज्ञान ही नहीं हैं और जिसने स्कुली इतिहास भी मेकाली शिक्षा का पढा हैं, सहजता से इसे स्वीकार भी कर लेगा|

– वो नहीं जानता कि हकिकत में बाजीराव ने धर्म व मात्रभुमी कि रक्षा में किसी-किस तरह के शोर्य व बलिदान को उभारा लेकिन आज एसी फिल्म देखकर यह जरूर मानने लग जायेगा की बाजीराव के प्राण मस्तानी के नाम पर गये!!!
– वो यह नहीं जानता कि अकबर एक क्रुर मानसीकता वाला साशक था व किस तरह से भारत भुमी पर उसने आतंक मचाया था लेकिन फिल्म में दिखायी गई झुठी प्रेम कथा के आगे स्वयं के स्वाभीमान की अर्थी सजालेगा!!!

यह एक मुलभुत तथ्य हैं की गुलामी काल के पहले का भारतीय समाज कट्टरता जैसे शब्द से बिलकुल ही अनजान था| ना ही उसने उस दरीदंगी व वहेशीपन कि कभी कल्पना भी कि थी जैसी मुगलो द्वारा फैलायी हमारी पवान धरा पर फैलायी और ना ही आपसी कोई द्वेष थे जिनके तले कोई भी वर्ग स्वयं को पीडीत कह सके लेकिन आज भारतीय समाज के प्रती हिनभावना से भरे ये फिल्मकार एसे भारत को न जानना चाहते हैं और ना ही बताना चाहते हैं| भारतीय संस्कृती पर सवाल उठाने वाले ये फिल्मकार उन बर्बरता व दरिंदगी भरे किस्सो को कभी नहीं उठाते जिसने हमारे समाज को कट्टर बनने पर मजबुर किया था, वे उन किस्सो को मुद्दा नहीं बनाते जिसने हमारे सभ्य समाज में फुट-डालो और राज करो के तहत द्वेश फैलाये…

— वे कभी नहीं दिखायें कि किस तरह मुगल साशक सिर्फ युद्ध नहीं किया करते थे बल्की जहाँ से गुजरे वहाँ के पुरष वर्ग का खात्मा कर गाँवों कि स्त्रीयो को किस दरींदगी से लुट कर जील्लत भरी जींदगी देते थे
— वे कभी नहीं बताना चाहेंगे कि उनकी दरींदगी के आतंक से बचने के लिये स्त्रीयों ने भी हथीयार उठा लिये थे, स्त्रीयाँ स्वयं आग में कुदकर जौहर करलिया करती थी व हमारे असहाय समाज ने बालिका हत्या, सती जैसे चलन को मजबुरी में अपनाना शुरू करदिया था!
— वे यह कभी नहीं बतायेंगे कि भारत पर वे अपने धर्म का परचम लहराने के लिये किस तरह जबरन लोगों इस्लाम कबुल करवाया करते थे यहाँ की प्राचीन धरोहरो को तहस-नहस कर मस्जीदे खडी कर दी थी
— वे यह भी नहीं बता पायेंगे कि किस तरह इन विदेशी साशकों ने हमारी समाज, प्रकृती, प्राणी यहाँ तक की कण-कण को पुजने वाली भारती मानसीकता में किस तरह कट्टरता भर दी लेकिन गुलामी काल के बाद उभरी इस कट्टरता को लेकर वह माहोल अवश्य बनाना चाहते हैं जिससे आज का युवा अपनी संस्कृती पर हेय दृष्टीकोण अवश्य धारण करले|

यदी वे गुलामी काल से गुजरे समाज के दर्द भरे किस्सो को बताने लगेंगे तो आज का सोया आम भारतीय जागृत होकर अपनी आजादी का मुल्य पहचान लेगा, स्वाभीमानी व सतर्क हो कर अपना राष्ट्रहीत कि दिशा चल पडेगा| जाहीर हैं कि इन फिल्म नीर्माताऔ को इससे ज्यादा दिलचस्पी विदेशो से मिलने वाले मोटे फंड पर हैं और एसा करना इनके विदेशी आकाऔ को कतई मंजुर भी नहीं होगा|

फिल्म निर्माता के लिबास में छुपे इन गद्दारों सहीत किसी को भी यदी भारतीय समाज का कट्टरपन ही दिखाई देता हैं तो यह कहुँगा की गर्व हैं मुझे मेरे भारतीय समाज की कट्टरता पर| यदी इस समाज ने अपने बीते हुवे दरीदंगी भरे काल में अपनी सभ्यता के प्रती कट्टरता ना अपनाई होती तो आज हिंदुस्तान भी कब का मुगलीस्तान बना दिया गया होता और भविष्य में भी यदी भारतीय समाज ने गलती से भी कभी अपने स्वाभीमान के प्रती कट्टरता भुला दी तो मुगलीस्तान बनने से नहीं बच सकेगा|

विशेष नोट: भारतीय चेनल व बालीवुड द्वारा भारती समाज में द्वेष फैलाने व हमारी सांस्कृतीक विशेषता को मिटाने के लिये में भारी विदेशी निवेष लगा हुवा हैं

# बहिष्कार करे एसे फिल्मकारो का जो हमारी संस्कृती को बदनाम करे #

|| वंदेमातरम् ||

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