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महाभारत को जियो

किसी ने कहा – यह राजनीति हैं! 

किसी ने कहा – यह सांप्रदायिकता हैं!! 

किसी ने कहा – यह कट्टरवाद हैं!!! 
और… 

किसी ने कह दिया – यह तो बचपना हैं!!!! 😏
लेकिन हमने भी अपना मत स्पष्ट कर दिया… 

आप दृष्टिकोण कोई भी लगा लो, 

हर तरह से यह एकमात्र धर्मयुद्ध हैं!!! 👊🚩
☝🏿 वही धर्मयुद्ध जो अधिकार के लिए लडा गया था

☝🏿 वही धर्मयुद्ध जो मानवता के लिए लडा गया था

☝🏿 वही धर्मयुद्ध जो राष्ट्र के लिये लडा गया था 

…. और आज भी लड़ा जा रहा!🔥
_ना ही उस धर्मयुद्ध कोई निष्पक्ष रह सका…_

_ना ही इस धर्मयुद्ध में कोई निष्पक्ष रह सकता हैं!_ 🔥
जो धर्म के साथ नहीं हैं अथवा अधर्म पर मौन धारण किये हुए हैं…निःसंदेह…

 उन्हें अधर्म के पक्ष में मान कर चलो 🔥

ज्ञात रहे 👇
जब भी महाभारत से बचना चाहोगे

अधर्मी ही तुम पर राज करेंगे!! 

अत: प्रत्येक पल “चक्रधारी” का ध्यान धरो! 

प्रत्येक पल, केवल महाभारत को जीयो!! 
लक्ष्य ही जीवन हैं, जिवन का एक ही लक्ष्य!

धर्म की, विजय हो! पापियों का, सर्वनाश हो! 
🚩 जयतु जयतु हिंदुराष्ट्र 🚩

🚩 🔥🔥🔥🔥🔥🔥  🚩

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आज के मुर्ख हिंदु! 

किसी युग में होता था विद्वान बडा हिंदु …

… आज तो बडा ही मुर्ख नजर आ रहा!!!



हाल के वर्षों में मैने भारतीयों में एक अजीब सी बात देखी है कि हम पाना सब चाहते है लेकिन उसके लिये कुछ देना नही चाहते है। 
यह बात हम जानते है लेकिन फिर भी इससे मुहँ चुराय रहते है। ऐसा नही है कि यह आज की बात है, यह पहले से कुछ भारतीय नस्लों में सम्मिलित था। 
आज मुफ्त या सब्सिडी या आरक्षण जैसी विकृतियों का एकाधिकार या इसकी चाह हमको अपने आप से हीन बना रही है। 
यदि सत्यनिष्ठा से इसको समझा जाए तो सारी गलती हम भारतीयों की भी नही है क्योंकि स्वतन्त्रता मिलने के बाद से ही हम बिना अपना कर्तव्य निभाए…. अधिकार मिलने को अपना अधिकार मान बैठे है।



पिछले 7 दशकों से यह पृवत्ति इतना विकराल रूप ले चुकी है कि भारतीयों का ही एक बड़ा वर्ग, राष्ट्र चेतना के स्पंदन से ही विमुख हो गया है। यह वर्ग स्वाभिमान वाली भाषा तो दुर, स्वाभिमान शब्द से पुरी तरह अज्ञान हो चुका हैं। ध्यान देने वाली बात यह भी हैं कि एसी प्रवृत्ति से ग्रस्त लोगों की संख्या शिक्षित वर्ग में भरमार हैं।



लेकिन यह भारतीयों में हुआ क्यों? 
इन लोगो में राष्ट्र के अस्तित्व के प्रति संवेदनशीलता का आभाव क्यों है?’
मुझे लगता है कि यह ऐसा इसलिये हुआ है क्योंकि हम पीढ़ी दर पीढ़ी, गुलामीयत को इस कदर ओढ़े रहे है कि हमने अपने अस्तित्व को बनाये रखने के स्वार्थ में अपने धर्म, समाज और राष्ट्र के ही अस्तित्व को नेपथ्य में धकेल दिया है। आज हमारे लिये, यह तीनों… धर्म, समाज और राष्ट्र हमारे लिए मात्र सुविधा के तत्व है, जिस को हम अपनी स्वेच्छा से, अपने लिये अलिंगनकृत कर लेते है या उसे तज देते है। इसी ने ही ‘सिर्फ मेरा’ को स्वीकार्य कराया है और यही स्वार्थीता अब हमारी धमनियों में बहते रक्त में आ गयी है।
हम तो रोजाना की ज़िंदगी मे इतना भृष्ट हो गये है कि हम अपनी कमजोरियों को छुपाने हेतु धर्म, समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व की उपेक्षा को अपनी जीवन पद्यति बना डाला है। हमको जब बहुत राष्ट्र प्रेम उमड़ता है तो सिर्फ जयचंद और मीर जाफर का नाम लेकर, उनको अपवाद मानते हुये, हकीकत को छुपा जाते है। 
अपने ही मात्रभुमी की लाज को तार-तार करने वालो धुर्त भारतीयों से इतिहास भरा पडा हैं… 
#गोलकुंडा के किले को भी 1687 में इसी तरह विजित किया गया था। सिपहसलारों को खरीद लिया गया था और उन्होंने, पिछला गुप्त दरवाजा, आक्रमणकारियों के लिए खोले दिया था।
#सतारा का परली का किला, 1700 में जो की मराठा सरकार का केंद्रबिंदु था, उस पर औरंगजेब ने पैसा देकर कब्जा किया था।
#औरंगजेब ने 1701 में, मराठा सेना के सेनापति त्रिम्बक को पैसे से ही खरीदा था और उसने  वर्धनगढ़, नांदगीर , वंदन और चन्दन  किले पर बिना लड़े, मुगलो को कब्जा कराया था।
#खेलना में अमबेर के सवाई राजपूत, मुगलो से लड़े थे। वे उनको हरा रहे थे लेकिन उनके सेनापति परुशराम ने, मुगलो से पैसा लेकर, वो किला मुगलो को जितवा दिया था।
#अवध की गवर्नरशिप के वादे पर, 1720 में, गिरधर बहादुर ने इलाहाबद के दरवाजे, मुगलो के लिए खोल दिए थे और उन्होंने, उस पर कब्जा कर लिया था।
#राजा श्रीनगर ने, दारा शिकोह के लड़के, सुलेमान को, पैसा लेकर, औरंगजेब के हवाले कर दिया था।
यह एक कटु सत्य है कि भारतीयों के एक बड़े वर्ग की धमनियों में अपने इन्ही पुरखों का रक्त अभी भी दौड़ रहा है।



ये नेहरू/गांधी परिवार, उनके कांग्रेसी गुलाम, ये आयातीत विचारधारा के पोषक वामपंथी, ये पश्चिम से आये आक्रांताओं से अपना डीएनए मिलवाते लोग, ये फोर्ड फाउंडेशन, मध्यपूर्व व वैटिकन के पैसे से उपजे लोग, ये कट्टर उलेमाओं के साथ हमबिस्तर होते राजनैतिज्ञ और नये आर्थिक परिवेश में न ढलने वाले लोग, यह यही लोग है।
आप कहेंगे कि होंगे एसे “कुछ” लोग! … ना… ना… इस “कुछ” के चक्कर में ना रहना… इनकी जनसंख्या तेजी से बढ़ रही। आप अपने आसपास थोड़ा भी ढूंढो तो तुरंत नजर आ जायेंगे। 
कैसे पहचानोगे??? 



अब देखिये, आजादी के बाद भी ७० सालो से तील-तील अपने हक व स्वाभिमान को तरसे भारत को आज जब एक मजबूत शतप्रतिशत देशी व सुसंस्कृत प्रधानमंत्री मिला हैं तो भी उन पर व्यंग कसने, ताने मारने व विरोध करने वाले प्रत्येक गली, मुहल्ले, गांव शहर तथा वाट्सअप ग्रूप पर भरे पड़े हैं… चिंदी-से-चिंदी मुद्दे को भी आग बना कर अपनी राष्ट्रीयता का आंचल स्वयं नोचते मिल जाते हैं। 
कोई यह तर्क दे सकता हैं कि ये तो हँसी-मजाक हैं! क्षमा करे… मुगल भी हँसी-मजाक में ही पहले रैंकी कर गये थे और हाँ! गौरे भी हँसी-मजाक में ही व्यापार कर गय थे। इतिहास से हमने कोई सिख तो लेनी नहीं! 

राष्ट्र ना जाने कब तक ऐसी हँसी-मजाक में गुलाम बनता रहेगा और ना फिर ना जाने कितने शिवाजी – महाराणाओ को बलिदान होना पड़ेगा। 
इन मंदबुद्धियों सहित एक राष्ट्र के तौर पर हम को यह स्वीकार करना ही पड़ेगा कि हम अपने अपने अनुपात में स्वेच्छा से हुये बेईमान, बेशर्म, गद्दार और गुलाम भारतीय हैं। 



समय रहते अपना छिछोरापन छोड सको तो छोड़ लो भाई अन्यथा इस लेख को भी हँसी-मजाक समझकर भुल सकते हो। 
|| वंदेमातरम् ||



(कुछ संकलित व कुछ स्वरचित) 

सुप्रीम कोर्ट और देशी त्योहार

गोविंदा पथको कि दमदार फेरी और विरोध
एक जज ने उडवाया पुरे सुप्रीम कोर्ट का मजाक

इस बार कि जन्माष्टमी पर्व पर गोविंदा ग्वालों ने जमकर धुमधाम के साथ उँची से उँची मटकी बेधड़क सीना तानकर फोडी और फोड़ते वक्त काले कपड़े दिखा कर न्यायपालिका को उसकी हद भी दिखाई।

आखिर क्यों वेलेंटाइन-डे जैसे विदेशी पर्व का बचाव करने वाली हमारी न्याय व्यवस्था देश के देशी पर्वो पर तुरंत सक्रिय हो जाती हैं, सवाल उठना वाजिब हैं।

इसका कारण भी मजबूत हैं, ऐसे विदेशी पर्वों पर जितनी भी सामग्री व सेवाएं बिकती हैं वे अधीकतर विदेशी या बड़ी कंपनियों, होटलों कि कमाई करवाती हैं और यह धंधा उनके लिये अरबो-खरबों कि कमाई का जरिया बनता हैं। अत: वे विदेशी प्रचलन के बचाव में पुरी तरह मुस्तैद रहते हैं व जिसके लिए वे अपनी कमाई का बंदरबांट भी करने को तैयार रहते हैं।

वहीं देशी त्योहारों में अधीकतर छोटे-छोटे कारीगरों व मजदूरों कि कमाई होती हैं जिसमें ना तो बंदरबांट का अवसर होता हैं और ना ही बचाव के लिए कोई बडी ताकत खड़ी मिलती हैं।

देशी त्योहारों को दबाने व विदेशी त्योहारों को उठाने के लिए वे विदेशी ताकते भी पुरी तरह सक्रिय रहती हैं जिनकी संपूर्ण कमाई ही देश में पनप रही विदेशी परंपराओं पर आधारित हैं व भारतीय संस्कृति जिनके लिए एक बड़ी रूकावट हैं।

भारतीय समाज कि आज सबसे बड़ी समस्या यह हैं भारतीय संस्कृति के विरोध में बडी से बडी ताकते तो लामबंद होकर जुटी हुई हैं लेकिन उसकी रक्षा हेतु हम अब तक बिखरे हुए हैं। यह भी एक सच्चाई हैं कि जब हमारा समाज एसे षड़यत्रों से अभी तक पूरी तरह अंजान हैं तो वे इनके विरोध में एकजुट होकर लड सके यह दुर की बात हैं। लेकिन इस बार एक सुर में गोविंदा पथकों द्वारा दिखाई एक जुटता नें भारतीय समाज के लिए शुभ संकेत दिए।

वह धर्म ही हैं जो हमें जोड़ सकता हैं : धर्मों रक्षति रक्षतिः

।। वंदेमातरम्।।

कांग्रेस और हिंदु-आतंकवाद का सच

भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों द्वारा इस खुलासे से कि समझौता ब्लास्ट मामले में पुरोहित व अन्यो के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं हैं, कांग्रेस के देशद्रोही चेहरे को एक बार फिर से उजागर कर दिया है।

UPA के समय में ही समझौता ब्लास्ट व मालेगांव ब्लास्ट के तुरंत बाद सौंपी गई NIA रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से हमले कि साजिश के तार पाकिस्तान व बंग्लादेश से जुडे होने कि बात कही गई थी लेकिन कांग्रेस सरकार के मंत्रियों ने उदे दर किनार कर हमले का दोष पुरी तरह से RSS व VHP के कार्यकर्ताओं के सिर लगाया।

इससे पूर्व भी इशरत के मामले में सोनिया सरकार के गृह मंत्री के झूठे शपथ पत्रों से यह सिद्ध हो चुका हैं कि वे आतंकियों को बचाने के लिए हिंदू नेताओ और संतो पर झूठे मामले दर्ज करते थे। कांग्रेस के मोदी के खिलाफ ‘झुठे एंकाऊंटर’ कि धज्जीया तब से उडनी शुरू हो गई थी जब से अमेरिका में कैद आतंकी डेविड हेडली ने इशरत को आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा कि आत्मघाती दल का हिस्सा बताया था।

भारत के खिलाफ रची गई एसी घीनोनी व राष्ट्रद्रोही हरकत के पीछे कांग्रेस के तीन लक्ष्य साफ तौर से उभरकर आते हैं…

पहला – RSS व VHP जैसी राष्ट्रवादी संगठनों कि साख को धुमील करना जिससे वे आम जनता के लिये अपेक्षीत बने रहे।

दुुसरा – इस तरह से वे पूरे भारत में सांप्रदायिक कट्टरता को बढावा देने कि कोशिश में लगे थे जिससे अल्पसंख्यक वोट बैंक डर कर उनके पक्ष में खडा रहे।

तीसरा – विश्व स्तर पर हिंदू-आतंकवाद को मुद्दा बनाकर पुरे विश्व में भारत को बदनाम करना जिससे भारत कि पहचान भी आतंक समर्थित देशों मे होने लगे जिसमें सिधा फायदा पाकिस्तान का था जो कश्मीर मुद्दे पर त्रिपक्षीय वार्ता कि मंशा को पुरा कर सकता था।

इस संबंध के कुछ ध्यान देने वाले तथ्य….

समझौता ब्लास्ट में जहाँ कर्नल पुरोहित व चार अन्य पिछले 9 साल से जेल में बंद हैं वहीं मालेगांव ब्लास्ट में साध्वी प्रज्ञा सिंह सहित अन्य सात-सालों से जेल में बंद हैं। यहाँ तक कि जेल में ही साध्वी प्रज्ञा कैंसर से भी ग्रसित हो चुकी हैं लेकिन अदालतों से जमानत भी नामंजूर ही कि गई। यह जान कर और भी हैरत होगा कि अब तक सबूत के अभाव में इनके खिलाफ एक भी चार्जशीट तक दाखिल ना हो सकी। इसी तरह इशरत जहां केस में बंजारा जैसे अधिकारी जिनको पुरस्कृत किया जाना चाहिए था उन्हे भी चार साल जेल में बंद कर रखा गया।

इन सबकी गलती मात्र इतनी ही थी कि ये राष्ट्रवादी संगठनों से जुडे थे, देश के लिये कार्यरत थे व हिंदु समुदाय से थे।

पहले सिमी जैसे देशद्रोही संगठनो को समर्थन और उसके बाद बिना सबूतों के हिन्दू आतंकवाद शब्द को गढ़ना, यह बताता है  कि सोनिया गाँधी  सत्ता प्राप्त करने के लिए किसी भी सीमा तक जाकर देश को नुकसान पंहुचा सकती है। सोनिया ने न केवल आतंकियों के हौंसले बढ़ाये हैं अपितु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का मजाक बनवाया है। इन्होने झूठे मामलों में हिन्दुओ को फंसाकर अल कायदा के सहायक बनकर असली आतंकियों को छोड़ने का अपराध भी किया है।

कांग्रेस के इस षडयंत्र में फँस कर मैकाले कि शिक्षा से शिक्षित एक वर्ग व इनके साथ बिकाऊ मिडिया RSS व VHP कि तुलना आतंकी संगठनों से करने को तुली रहती हैं। आज यह वर्ग व विदेशी मिडिया देश व संस्कृति के लिये आवाज उठाने वाले हर शख्स को एक संघी का ठप्पा लगाकर पेश करता आया हैं।

देश की सुरक्षा से जुड़े इन अति संवेदनशील मामलों में कांग्रेस की यह कार्यवाही एक अपराधिक षड़यंत्र है। इन अपराधों के लिये सोनिया -राहुल पर राष्ट्रद्रोह का केस बनता हैं। एसे षडयंत्रों के लिए जनता की जागरूकता ही एक मात्र उत्तर बन सकती हैं।

|| जय हिंद ||

#WCFIndiasPride : Will Fight Back !

#WCFIndiasPride : Will Fight Back !

भारत में भारतीय संस्कृती को मिटाने वाली ताकतों ने अब आर्ट-आफ-लीवींग को नीशाना बनाया| दिल्ली में यमुना नदी के किनारे होने वाले आर्ट-आफ-लिवींग के अतंराष्ट्रीय सांस्कृतीक सम्मेलन जो कि यमुना नदी के किनारे ११ से १३ मार्च ११ से १३ मार्च को निर्धारीत हैं उसके पाछे तरह-तरह के विहाद फैलाया|

ये वही ताकते हैं जिन्होने कई तरीकों से हमारे पुज्य साधु-संतो के खिलाफ तरह-तरह के षडयंत्र रचते आ रहे हैं और जिस तरह साधु-संतो के पीछे बिकाऊ मिडीया भी अपनी एडीचोटी का जोर लगाती आया हैं उसी तरह इस बार भी मिडीया व बिकाऊ पत्रकार का एक वर्ग ने अपना बजार लगाने कमर कस था|

पर्यावरण के रक्षक उस समय कहाँ मर जाते हैं जब यमुना तट पर बडी-बडी बिल्डींगे निर्माण होती रहती हैं…मात्र तीन दिवसीय सांस्कृतीक कार्यक्रम में रौडे अटकाने के लिये सारा पर्यावरण प्रेम उमड पडा!!!

कुछ ही दिनो पहले पाकिस्तानी गायक गुलाम अली के कार्यक्रम का जब विरोध उठा था तब सारे विपक्ष व बिकाऊ मिडीया ने एक सुर में उसका साथ दिया था लेकिन भारत में ही भारतीय सांस्कृतीक कार्यक्रम के पक्ष में किसी ने आवाज बुलंद नहीं की!!!

यह एक सांस्कृतीक आतंकवाद का ही हिस्सा हैं जिसमें भारतीय संस्कृती को दबा कर खत्म करने का षडयंत्र चल रहा हैं जिसके तहत ही हमारी संत परमपरा पर रह-रह कर हमले होते रहे हैं|

हमे यह ठान कर चलना हैं कि इन मक्कारों कि चलने नहीं दि जायेगी… देश के हर राष्ट्रप्रेमी दिवार बन कर इनके विरोध में खडा नजर आयेगा

|| वंदेमातरम् ||

तोडने की साजीश

जरा सोचिये…

अखलाक (दादरी) के बहाने …!
हमें साम्प्रदायिक बनाया

रोहित (हेदराबाद) के बहाने ….!
हमें जातिवादी बताया

अब तृप्ती देसाई (शनि शिगणांपुर) के बहाने ..
हमें स्त्रीयों पर पाबंदी लगाने वाला
पुरूष प्रधान समाज साबीत किया जा रहा है…

चारों तरफ से घेरा जा रहा है..
हमें टुकडों में तोडा जा रहा हैं…
उकसाया जा रहा हैं ताकी हम अपनी सहनशीलता
को त्याग हिंसा पर उतर आये…

और यदी किसी ने उकसावे में प्रतीकार कर दिया तो फिर उससे प्रमाणीत किया जायेगा की भारत “असहनशील” हो गया हैं!!!

समजो इन विदेशी हाथो कि कठपुतली, इन सेक्युलर मक्कारो और मिडीयाई गद्दारों द्वारा फैलाई जा रही साजीशो को…

इस देश कि अखंडता तब तक सुरक्षीत नहीं जब तक देश का हिंदु जागृत व एकझुट नहीं!!!

विशेष:
” हिंदु ” कोई धर्म नहीं बल्की भारतीय जीवन शैली का नाम हैं| इस देश की मिट्टी में जन्मा हर शक्स जो भारतीय मिट्टी में पनपे विभीन्न धर्मों का अनुयायी हो अथया मानता हो कि उसके पुर्वज उनसे जुडे हुवे थे या वह जो भारतीय संस्कृती व सभ्यता से जुड कर खुद को भाग्यशाली मानता हो, वह एक “हिंदु” ही हैं|

हिंदु = जेन + सिख + बोद्ध + सनातन
(सभी धर्म जो देश कि ही मिट्टी में पनपे)

|| जागो और जगाऔ, देश बचाऔ ||

……..जन-जन को इसे भेजो…….

हिंदु विरोधी मिडीया का ताजा वार | शनि शिगणांपुर विवाद

आज कल बीकाऊ मिडीया शनि शिगणांपुर में स्त्रीयों के प्रवेश को लेकर बडी-बडी बहसो पर उतर आया हैं| यह वही भाडे के टट्टुवे पत्रकार हैं जो हिंदु-विरोधी रायता फैलाने की सुपारी उठा रखे हैं|

इन्हे मुद्दा नहीं भी मिले तो ये मुद्दा पैदा करने में माहीर हैं| तृप्ती देसाई नाम की महीला जिसने शनीशिंगापुर में महिलाऔ के प्रवेश पर हंगामा मचा रखा हैं वह पहले अन्ना और कांग्रेसी मंत्रीयों के साथ कई बार नजर आ चुकी हैं| जाहीर हैं, यह मुद्दा सुनीयोजीत तरीके से बनाया गया हैं| वास्तव में इस मुद्दे का धरातल हैं ही नहीं क्युँ की धार्मीक महीला स्वयं से ही शनीदेवता के दुर से ही दर्शन करेगी किंतु चंडाल चौकडी जिन्हे केवल बहस खडी करनी हैं वे किसी भी हद तक जा सकते हैं| तृप्ती देसाई – इस चंडाल चौकडी का तरोताजा उदाहरण हैं|

पहले भी मंदीरो में लडकीयों के जिन्स ना पहनने वाले जैसे बयानों के विरोध में हमारी मिडीया चेनलों की लम्बी-लम्बी बहसे तो जरूर ही सुनी होगी| इनबहसों में बयान देने वाले को संकुचीत सोच वाला व महीलाऔ के प्रती अव्यवहारी सोच वाला बताने कि हर पत्रकार कि होड सी लग जाती हैं| क्या किसी पत्रकार ने इस पहलु से इस पर बहस करने कि कोशिश कभी की हैं कि मंदिर में शालीनता व सादगी बनाये रखने कि दृष्टी से सही भी हो सकता हैं!!!

अब कुछ ही समय पहले कि इस खबर पर भी गौर किजीये….

मुंबई शहर कि विख्यात दरगाह हजीहली में वहाँ के ठेकेदारों ने स्त्रीयों के प्रवेश पर पुरी तरह से रोक लगा रखी हैं| इस खबर पर हमारे मिडीयाँ जगत को अब तक साँप सुँघा हैं|

इतना सन्नाटा पसरा हैं कि अभी तक मुंबई के लोग भी इस खबर से पुरी तरह वाकिफ ना हो सके हैं| कई मुस्लीम जोडे दरगाह तक साथ जाकर पुरूष वर्ग स्त्री को वहीं अकेले छोड कर अंदर जाना पड रहा हैं| किसी पत्रकार में हिम्मत हि नहीं हो सकी के वे इस मुद्दे पर बहस कर सके|

इनके समुदाय में इन कट्टर पंथीयों द्वारा जबरन थोपी गई बुर्का प्रथा पर पहले ही मिडीया जगत ने मोन धारण कर रखा था और स्त्रीयों के प्रती किये गये इस अव्यवहारीक प्रतीबंध पर भी ये पुरी तरह खामोश हैं|

एसे सेकडो उदाहरण भरे पडे हैं जब विदेशी पैसा पर पलने वाला मिडीया हिंदु धर्म के विरोध में खुलकर भौकता हैं लेकिन जब विदेशी धर्मो की बात आती हैं तो चुप्पी साध लेता हैं…

उदाहरणतया…
— साधु-संतो पर लगे आरोपों पर हफ्तो बहस करना किंतु विदेशी धर्मगुरूऔ के अपराधो पर खामोशी
— संतो के बयानो को ‘विवादीक’ बताना और विदेशी धर्मगुरूऔ के फरमानो व फतवों पर मौन
— हिंदु धर्म की विज्ञान प्रमाणीत मान्यताऔ को भी अंधविश्वास कि श्रेणी में खडा कर देना किंतु विदेशी धर्मो के निराधार व अंधविश्वासी प्रचलन को नजर अंदाज करना

|| जागो हिंदु, जागो ||