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नारी तु नारायणी 

​मैं एक स्त्री हुँ… 👩‍👧‍👦
जब जन्मी तब पिताजी का नाम मिला…

 यह पिताजी का गर्व था
माता-पिता ने मुझे पहनावे व 

चाल-चलन के संस्कार सिखाये

और जिन्हें अपना कर मेैने अपने परिवार 

के स्वाभिमान का मस्तक सदैव उचा रखा

 यह मेरी जिम्मेदारी थी
विवाह पश्चात पति का नाम मिला

नया घर व परिवार में सम्मान मिला

 यह मेरा हक था
पुत्र – सुपुत्री को मैंने अपने संस्कारों में ढाला

उन्हे हमारे इतिहास व अध्यात्म से जोड़ा 

जिससे समाज व देश के ‘कल’ को 

मेरे परिवार से भावी पीढ़ी मिले

 यह मेरी चुनौती थी
नारी कि समझ पर ही जन-जीवन 

व संपूर्ण सृष्टि का मंगल टिका हुआ हैं…

यह ज्ञान मात्र हमारी संस्कृति कि ही देन हैं। 
मैं एक भारतीय नारी हुँ इसलिए मैं अपनी जिम्मेदारी समझती हूँ…. और मुझे अपनी इस समझ पर गर्व हैं। 
सिर्फ महिला दिवस कहने में कोई दम नहीं 

आओ मनाए… भारतीय महिला दिवस
🚩 सभी बहनों को हार्दिक शुभकामनाएँ 🚩

…. और पढे़…. 

*भारतीय महिलाएं प्राचीन काल से ही हैं आर्थिक क्षमता संपन्न*
वामपंथी विचार धारा वाले इतिहासकारों व समाजिक बुद्धिजीवियों ने हमें हमारी पाठ्यपुस्तकों में पढ़ने को मजबूर किया कि हमारी भारतीय संस्कृति में महिलाएं केवल घरेलू कार्यभार ही संभालती आई हैं व घर कि आमदनी में उनका योगदान केवल शुन्य ही हुवा करता था!!!
क्या यह सत्य हैं? 
अब देखिए… यह कितना विरोधाभास ज्ञान हैं। यह तो सभी जानते हैं कि भारत एक कृषि प्रधान देश रहा हैं अर्थात अधिक तर पूर्वकालिन परिवार कृषि व गोपालन पर ही आधारित होते थे। और इन दोनो ही कार्यों में किसान कभी अकेला नहीं होता हैं बल्कि पुरा परिवार उसका हाथ बटाता हैं। फिर भले ही वह किसान कि माता हो, बहन हो, पत्नी हो अथवा पुत्री हो…. सभी अपनी क्षमता के अनुरूप योगदान करते हैं। कृषि व गोपालन दोनो ही परिवार को आर्थिक सबलता प्रदान करते हैं फिर किस आधार पर ये बुद्धिजीवी भारतीय प्राचीन परंपरा में महिलाओं को केवल घरेलू कार्यभार संभालने तक का ठप्पा लगाकर प्रस्तुत करते आये हैं? 
आज भी कई पढ़े-लिखों कि सोच में इन वामपंथियों द्वारा प्रस्तुत किया गया नजरिया ही जमा हुवा हैं जिससे वे हमेशा भारतीय परंपरा को कोसते नजर आते हैं।  

#KnowYourEnamy #KnowOurVedicCulture #KnowYourHistory

सुप्रीम कोर्ट और देशी त्योहार

गोविंदा पथको कि दमदार फेरी और विरोध
एक जज ने उडवाया पुरे सुप्रीम कोर्ट का मजाक

इस बार कि जन्माष्टमी पर्व पर गोविंदा ग्वालों ने जमकर धुमधाम के साथ उँची से उँची मटकी बेधड़क सीना तानकर फोडी और फोड़ते वक्त काले कपड़े दिखा कर न्यायपालिका को उसकी हद भी दिखाई।

आखिर क्यों वेलेंटाइन-डे जैसे विदेशी पर्व का बचाव करने वाली हमारी न्याय व्यवस्था देश के देशी पर्वो पर तुरंत सक्रिय हो जाती हैं, सवाल उठना वाजिब हैं।

इसका कारण भी मजबूत हैं, ऐसे विदेशी पर्वों पर जितनी भी सामग्री व सेवाएं बिकती हैं वे अधीकतर विदेशी या बड़ी कंपनियों, होटलों कि कमाई करवाती हैं और यह धंधा उनके लिये अरबो-खरबों कि कमाई का जरिया बनता हैं। अत: वे विदेशी प्रचलन के बचाव में पुरी तरह मुस्तैद रहते हैं व जिसके लिए वे अपनी कमाई का बंदरबांट भी करने को तैयार रहते हैं।

वहीं देशी त्योहारों में अधीकतर छोटे-छोटे कारीगरों व मजदूरों कि कमाई होती हैं जिसमें ना तो बंदरबांट का अवसर होता हैं और ना ही बचाव के लिए कोई बडी ताकत खड़ी मिलती हैं।

देशी त्योहारों को दबाने व विदेशी त्योहारों को उठाने के लिए वे विदेशी ताकते भी पुरी तरह सक्रिय रहती हैं जिनकी संपूर्ण कमाई ही देश में पनप रही विदेशी परंपराओं पर आधारित हैं व भारतीय संस्कृति जिनके लिए एक बड़ी रूकावट हैं।

भारतीय समाज कि आज सबसे बड़ी समस्या यह हैं भारतीय संस्कृति के विरोध में बडी से बडी ताकते तो लामबंद होकर जुटी हुई हैं लेकिन उसकी रक्षा हेतु हम अब तक बिखरे हुए हैं। यह भी एक सच्चाई हैं कि जब हमारा समाज एसे षड़यत्रों से अभी तक पूरी तरह अंजान हैं तो वे इनके विरोध में एकजुट होकर लड सके यह दुर की बात हैं। लेकिन इस बार एक सुर में गोविंदा पथकों द्वारा दिखाई एक जुटता नें भारतीय समाज के लिए शुभ संकेत दिए।

वह धर्म ही हैं जो हमें जोड़ सकता हैं : धर्मों रक्षति रक्षतिः

।। वंदेमातरम्।।