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दादरी v/s मालदा

#### दादरी v/s मालदा #####

एक तरफ “दादरी”, एक तरफ “मालदा”
एक में सिर्फ सेकडो थे तो एक में जमा हुवे थे लाखों
एक भडकाया गया था, एक “खुद-ब-खुद” भडक गया

एक में जो हत्या हुई थी वह था निर्दोष
एक में पीडीतो का ही नीकाला गया दोष

एक में मानवता हो गई थी शर्मशार
एक में धार्मीक भावना बनी आधार

एक में “हिंदुऔ” ने मचाया था कोहराम
एक में “असमाजीक” तत्वो का आया नाम

एक में हिंसक हुवे थे तुरंत बंदी
एक में अब तक खोज रहे हुडदंगी

एक पर मिडीया में ब्रेकिंग पर ब्रेकिंग न्युज
एक पर सारे मिडीया एक साथ फ्युज

एक पर सारे सेक्युलर नेताऔ को खुली मीली थी छुट
एक पर गलती से भी कोई जो पहोंचे…तो मौके कि “लुट”

एक पर देश का सेक्युलरीज्म लग गया था फटना
एक पर यह रह गई बनकर मात्र एक “स्थानीय” घटना

एक पर असहिष्णुता बना दी गई थी राष्ट्रीय आपदा
एक कि खबर अब भी तरस रही बनने को मुद्दा

एक पर पुरी गैंग ने अवार्ड वापसी को बनाया था हथीयार
एक के लिये आवाज उठाने को कोई नहीं हो रहा तयार

एक पर क्या शाहरूख! क्या आमीर!
सबके दिख गये थे “आँसु”
एक पर ये अपनी कला दिखाकर
छिपाते फिर रहे हैं “मुँह”!

एक से अल्पसंख्यक पड गये थे खतरे में
एक पर भला क्यों कोई पडे इस सदमें में

एक में लुटा दिये थे प्रसाशन नें रूपये मात्र ३४ लाख
एक पर अब भी जख्मी तलाश रहे न्याय की साख

कोई यह ना मान बैठे कि जो हुवा वह नसीब था
फर्क तो दोनो में होना बडा ही वाजीब था

एक तरफ देशभर में संगठीत सेक्युलर वोटबँक का सवाल था
और दुसरी तरफ….
आपस में ही लडने वाला,
धर्म को खिलौना समझने वाला,
राजनीती को गंदगी मानने वाला,
खुदगर्ज, नींद में डुबे रहने वालो का हाल था!!!

— दोनो घटना से व्यथीत —
— भविष्य के लिये चिंतीत —
— फिर भी तत्पर, सतर्क और कार्यरत —
— एक हिंदु राष्ट्रवादी —

|| वंदेमातरम् ||

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सौगंध मुझे इस मिट्टी की

नरेंद्र मोदी जी की कविता
 
 
narendra-modi-kavita

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सौगंध मुझे इस मिट्टी की, मैं देश नहीं मिटने दूंगा।
मैं देश नहीं रुकने दूंगा, मैं देश नहीं झुकने दूंगा।।

मेरी धरती मुझसे पूछ रही कब मेरा कर्ज चुकाओगे।
मेरा अंबर पूछ रहा कब अपना फर्ज निभाओगे।।

मेरा वचन है भारत मां को तेरा शीश नहीं झुकने दूंगा।
सौगंध मुझे इस मिट्टी की मैं देश नहीं मिटने दूंगा।।

वे लूट रहे हैं सपनों को मैं चैन से कैसे सो जाऊं।
वे बेच रहे हैं भारत को खामोश मैं कैसे हो जाऊं।।

हां मैंने कसम उठाई है मैं देश नहीं बिकने नहीं दूंगा।
सौगंध मुझे इस मिट्टी की मैं देश नहीं मिटने दूंगा।।

वो जितने अंधेरे लाएंगे मैं उतने उजाले लाऊंगा।
वो जितनी रात बढ़ाएंगे मैं उतने सूरज उगाऊंगा।।

इस छल-फरेब की आंधी में मैं दीप नहीं बुझने दूंगा।
सौगंध मुझे इस मिट्टी की मैं देश नहीं मिटने दूंगा।।

वे चाहते हैं जागे न कोई बस रात का कारोबार चले।
वे नशा बांटते जाएं और देश यूं ही बीमार चले।।

पर जाग रहा है देश मेरा हर भारतवासी जीतेगा।
सौगंध मुझे इस मिट्टी की मैं देश नहीं मिटने दूंगा।।

मांओं बहनों की अस्मत पर गिद्ध नजर लगाए बैठे हैं।
मैं अपने देश की धरती पर अब दर्दी नहीं उगने दूंगा।।

सौगंध मुझे इस मिट्टी की मैं देश नहीं मिटने दूंगा।
अब घड़ी फैसले की आई हमने है कसम अब खाई।।

हमें फिर से दोहराना है और खुद को याद दिलाना है।
न भटकेंगे न अटकेंगे कुछ भी हो हम देश नहीं मिटने देंगे।।

सौगंध मुझे इस मिट्टी की मैं देश नहीं मिटने दूंगा।
मैं देश नहीं रुकने दूंगा, मैं देश नहीं झुकने दूंगा।।

 

— श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी —

क्या लखनऊ, क्या वाराणसी (कवीता)

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क्या लखनऊ, क्या वाराणसी
जब साथ खडा हर भारतवासी
हर आँखो में अब अरमान जगा हैं
रही ना दुसरी कोई आस बाकी

सौ-सौ कजरी-राहुल हाथ मिलाले
नमो सुनामी को रोक नहीं पायेंगे
जीत के आयेंगे दम पर अपने
देश के कोने-कोने में नमो छा जायेंगे

बीजेपी के नाम पर खडा कर दो जीसे भी
अब किसी को क्या फरक पड जायेगा
क्युँ की बटन कमल का दबाते वक्त भी
हमें तो चेहरा सिर्फ नमो का नजर आयेगा

— संजय त्रिवेदी

अब ये नशा ना छुट पायेगा ( कवीता )

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अब ये नशा ना छुट पायेगा ( कवीता )

नशा अगर सिगरेट का होता
तो गर्लफ्रेंड के लिये छोड देता…

नशा अगर शराब का होता
तो फेमिली के लिये छोड देता…

नशा अगर चरस-गांजे का होता
तो जीने की तमन्ना के लिये छोड देता….

नशा लगा भी तो लगा देशभक्ति का
ना छुटते बनता, ना छोडा जायेगा…

दुश्मनों का जनाजा तो उठना ही हैं एक रोज
मैं ना रहा तो मेरे बाद भी ये “नशा” क्रांति कि मशाल जलायेगा !!!

— संजय त्रिवेदी की रचना

जह हिंद, जय माँ भारती !!!

आजादी के संग्राम का अब तांडव मचाने आया हुँ (कविता)

अब तांडव मचाना हैं !!!

अब तांडव मचाना हैं !!!

आजादी के संग्राम  का अब तांडव मचाने आया हुँ।
खाली हाथ नहीं आया साथ कफन भी लाया हुँ।

मंद हवा थम चुकी अब तुफान आने को हैं
सब्र का बांध टुट चुका सैलाब आने को हैं
दिलदहला देने वाला मंजर खडा कर दूंगा
और इंतजार नहीं अब इंकलाब आने को हैँ। Continue reading

सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयेंगे [कविता]

सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयेंगे

सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयेंगे

छोडो मेहँदी खडक संभालो, खुद ही अपना चीर बचा लो

द्यूत बिछाये बैठे शकुनि, मस्तक सब बिक जायेंगे

सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयेंगे |

कब तक आस लगाओगी तुम, बिक़े हुए अखबारों से,

कैसी रक्षा मांग रही हो दुशासन दरबारों से

स्वयं जो लज्जा हीन पड़े हैं वे क्या लाज बचायेंगे

सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो अब गोविंद ना आयेंगे |

कल तक केवल अँधा राजा,अब गूंगा बहरा भी है

होठ सील दिए हैं जनता के, कानों पर पहरा भी है

तुम ही कहो ये अश्रु तुम्हारे, किसको क्या समझायेंगे?

सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंदना आयेंगे |

 

— संकलन

जिंदगी एक सफ़र हैं [कविता]

 

जिंदगी एक सफ़र हैं इम्तिहान तो लेती ही हैं

जिंदगी एक सफ़र हैं
इम्तिहान तो लेती ही हैं

जिंदगी एक सफ़र हैं
इम्तिहान तो लेती ही हैं

कदम जब चलने लगे
राहों से वाकिफ ना थे

सुनी थी राहे सुनी डगर
सुना था जहां तन्हा सफ़र

हिम्मत टूटने ना दी
होंसला बुलंद था

रुकने का नाम न था
थकने का अरमान न था

वक्त ने करवट बदली
मुश्किलें आसान हुई

हमसफ़र मिलते गए
तन्हाई दूर होती गयी

कारवां बढ़ता गया
मंजिले मिलती गई

जिंदगी एक सफ़र हैं
इम्तिहान तो लेती ही हैं

— संजय त्रिवेदी