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“हारने” की चतुराई !!!

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हारने की चतराई

अब तक मोदी ने सिर्फ जीतने की कला दिखाई थी…
इस बार मोदी ने “हारनेे” की चतुराई भी निचोडी!!!
पाँच साल के लिये चुजा सोने के पिंजरे में बंद!!!
क्युँ की भागने की गुँजाईश ही नहीं छोडी!!!

खुश तो आपीये आज बेहद होंगे,
कहेंगे हमने History रच डाली
होश संभालना इनके बस में ही नहीं
इन सब Fool औ का एक ही माली

वादे एसे जो पुरे करने की भी औकात नहीं…
साथी भी मनचले, मुँह खोल दे तो हो जाये किरकरी
पहले मात्र २४ ने दिल्ली को बनाया था रंगमंच
अब पुरे के पुरे ६७ नमुने ! संभाल लियो “कजरी” !!!

पहले सिर्फ ४९ दिन का ट्रेलर नजर आया था
अब पुरे पाँच साल का “इंटरटेंटमेट….इंटरटेंटमेट… इंटरटेंटमेट”
मिडीया वालों के लिये हर रोज Breaking मसाला
इन बेकदरों से मोदी ने अब जा कर खुद को संभाला

दिल्ली अब महफीलो से हमेशा सजी रहेगी
किसी और की क्या जरूरत “कजरी” ही मुजरा करेगी
कभी वाह-वाह भी बटोर लेगी तो पचा ना पायेगी
ज्यादा इतरायेगी तो टमाटर-चपाटे भी खा जायेगी

दिल्ली का युवा खुलकर मन बहलाता रहेगा
फैसला भी उसका ही, दोष किसके सर करेगा
उम्मीदे ही इनलोगो ने आँखों मे एसी पाली
सालों से लुटती गद्दी,
खाक सेवा होगी, जब जेब ही हो चुकी थी खाली

विकास के लिये मानसीकता भी, विकास की जरूरी
मुफ्तखोरी जो पाले, अक्ल भी करती उनसे दुरी
पाठ नैतीकता का, अंग्रेजो की शिक्षा कैसे पढायेगी
देख तमाशा “अनेतिकता” का, शायद अक्ल इन्हे आयेगी

मंच सजवाकर विदुषको का,
मोदी ने मजेदार राह बना ली
परोसकर इनकी मुर्ख लिलाऔ को
अघौषित प्रतीयोगीता नाम अपने कर डाली

Center ने जो किये थे अब तक अभुतपुर्व प्रदर्शन,
किसी पत्रकार ने अबतक ना थी जिनपर रोशनी डाली
अब जब करना पडेगा Evolution हुडदंगो से
खुद-ब-खुद चीख उठेगी, कर्मठता की हरीयाली

धन्य तेरा “त्याग”, धन्य तेरा ब्रम्हग्यान
धन्य तेरी राष्ट्रभक्ति, तु योद्धा बडा ही निराला
देश को खिलोना समझने वालो को
खेल-खेल में ही तुने, खिलोना जो बना डाला
खेल-खेल में ही तुने, खिलोना जो बना डाला

—  संजय त्रिवेदी

सौगंध मुझे इस मिट्टी की

नरेंद्र मोदी जी की कविता
 
 
narendra-modi-kavita

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सौगंध मुझे इस मिट्टी की, मैं देश नहीं मिटने दूंगा।
मैं देश नहीं रुकने दूंगा, मैं देश नहीं झुकने दूंगा।।

मेरी धरती मुझसे पूछ रही कब मेरा कर्ज चुकाओगे।
मेरा अंबर पूछ रहा कब अपना फर्ज निभाओगे।।

मेरा वचन है भारत मां को तेरा शीश नहीं झुकने दूंगा।
सौगंध मुझे इस मिट्टी की मैं देश नहीं मिटने दूंगा।।

वे लूट रहे हैं सपनों को मैं चैन से कैसे सो जाऊं।
वे बेच रहे हैं भारत को खामोश मैं कैसे हो जाऊं।।

हां मैंने कसम उठाई है मैं देश नहीं बिकने नहीं दूंगा।
सौगंध मुझे इस मिट्टी की मैं देश नहीं मिटने दूंगा।।

वो जितने अंधेरे लाएंगे मैं उतने उजाले लाऊंगा।
वो जितनी रात बढ़ाएंगे मैं उतने सूरज उगाऊंगा।।

इस छल-फरेब की आंधी में मैं दीप नहीं बुझने दूंगा।
सौगंध मुझे इस मिट्टी की मैं देश नहीं मिटने दूंगा।।

वे चाहते हैं जागे न कोई बस रात का कारोबार चले।
वे नशा बांटते जाएं और देश यूं ही बीमार चले।।

पर जाग रहा है देश मेरा हर भारतवासी जीतेगा।
सौगंध मुझे इस मिट्टी की मैं देश नहीं मिटने दूंगा।।

मांओं बहनों की अस्मत पर गिद्ध नजर लगाए बैठे हैं।
मैं अपने देश की धरती पर अब दर्दी नहीं उगने दूंगा।।

सौगंध मुझे इस मिट्टी की मैं देश नहीं मिटने दूंगा।
अब घड़ी फैसले की आई हमने है कसम अब खाई।।

हमें फिर से दोहराना है और खुद को याद दिलाना है।
न भटकेंगे न अटकेंगे कुछ भी हो हम देश नहीं मिटने देंगे।।

सौगंध मुझे इस मिट्टी की मैं देश नहीं मिटने दूंगा।
मैं देश नहीं रुकने दूंगा, मैं देश नहीं झुकने दूंगा।।

 

— श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी —

क्या लखनऊ, क्या वाराणसी (कवीता)

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क्या लखनऊ, क्या वाराणसी
जब साथ खडा हर भारतवासी
हर आँखो में अब अरमान जगा हैं
रही ना दुसरी कोई आस बाकी

सौ-सौ कजरी-राहुल हाथ मिलाले
नमो सुनामी को रोक नहीं पायेंगे
जीत के आयेंगे दम पर अपने
देश के कोने-कोने में नमो छा जायेंगे

बीजेपी के नाम पर खडा कर दो जीसे भी
अब किसी को क्या फरक पड जायेगा
क्युँ की बटन कमल का दबाते वक्त भी
हमें तो चेहरा सिर्फ नमो का नजर आयेगा

— संजय त्रिवेदी

अब ये नशा ना छुट पायेगा ( कवीता )

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अब ये नशा ना छुट पायेगा ( कवीता )

नशा अगर सिगरेट का होता
तो गर्लफ्रेंड के लिये छोड देता…

नशा अगर शराब का होता
तो फेमिली के लिये छोड देता…

नशा अगर चरस-गांजे का होता
तो जीने की तमन्ना के लिये छोड देता….

नशा लगा भी तो लगा देशभक्ति का
ना छुटते बनता, ना छोडा जायेगा…

दुश्मनों का जनाजा तो उठना ही हैं एक रोज
मैं ना रहा तो मेरे बाद भी ये “नशा” क्रांति कि मशाल जलायेगा !!!

— संजय त्रिवेदी की रचना

जह हिंद, जय माँ भारती !!!

गलती ना कर बैठना साथियों (कविता)

Save Hindutva, Save Nation

Save Hindutva, Save Nation

गलती ना कर बैठना साथियों
अपना धर्म भुल जाने की|
वर्ना नोबत आ सकती हैं
माँ-बहनो की अस्मत लुटाने की|

ठोक सीना, दहाड के कहना
हा मैं हिंदू नहीं जरुरत घबराने की|
जब लड के ले सकता हुँ हक अपना
क्यों कोशीश करु गद्दारों को मनाने की| Continue reading

सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयेंगे [कविता]

सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयेंगे

सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयेंगे

छोडो मेहँदी खडक संभालो, खुद ही अपना चीर बचा लो

द्यूत बिछाये बैठे शकुनि, मस्तक सब बिक जायेंगे

सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयेंगे |

कब तक आस लगाओगी तुम, बिक़े हुए अखबारों से,

कैसी रक्षा मांग रही हो दुशासन दरबारों से

स्वयं जो लज्जा हीन पड़े हैं वे क्या लाज बचायेंगे

सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो अब गोविंद ना आयेंगे |

कल तक केवल अँधा राजा,अब गूंगा बहरा भी है

होठ सील दिए हैं जनता के, कानों पर पहरा भी है

तुम ही कहो ये अश्रु तुम्हारे, किसको क्या समझायेंगे?

सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंदना आयेंगे |

 

— संकलन

जिंदगी एक सफ़र हैं [कविता]

 

जिंदगी एक सफ़र हैं इम्तिहान तो लेती ही हैं

जिंदगी एक सफ़र हैं
इम्तिहान तो लेती ही हैं

जिंदगी एक सफ़र हैं
इम्तिहान तो लेती ही हैं

कदम जब चलने लगे
राहों से वाकिफ ना थे

सुनी थी राहे सुनी डगर
सुना था जहां तन्हा सफ़र

हिम्मत टूटने ना दी
होंसला बुलंद था

रुकने का नाम न था
थकने का अरमान न था

वक्त ने करवट बदली
मुश्किलें आसान हुई

हमसफ़र मिलते गए
तन्हाई दूर होती गयी

कारवां बढ़ता गया
मंजिले मिलती गई

जिंदगी एक सफ़र हैं
इम्तिहान तो लेती ही हैं

— संजय त्रिवेदी