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श्रीमद्भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता के विषय में लोगों के
कुछ अजीब व असत्य विचार…

१) बुढ़ापे में पढ़ेंने योग्य, अभी समय नहीं

द्भगवद्गीता में जो ज्ञान हैं वह दर्शाता हैं कि मनुष्य अपने मानवीय जीवन को किस तरह सफल कर सृष्टि कल्याण कर सकता हैं। अर्थात यह वह ज्ञान हुवा जिसे मनुष्यों को अपने जिवन कि शुरूवात (बालपन अथवा जल्द-से-जल्द) में ही अर्जीत कर लेना चाहिए। ऐसे में यदि कोई यह विचार लेकर बैठा हैं कि वह बुढ़ापे में गीता पढ़ेगा तो यह कैसी मूर्खता होगी क्योंकि कि तबतक उसका जीवन तो गुजर चुका होगा। फिर तो मात्र पछतावा मिलेगा कि जिवन किस तरह से जीना था और संपूर्ण जीवन किस तरह से व्यर्थ व्यतीत कर दिया।

२) पढ़ने वाला परिवार छोड़कर साधु बन जाता हैं
३) साधु-संतों के पढ़ने योग्य

भले ही गीता का ज्ञान बेहद कम लोगों को होगा किंतु यह तथ्य से हर कोई परिचित होगा कि भगवद्गीता अर्जुन व श्रीकृष्ण के मध्य हुवे संवाद का सार हैं। वह भी ऐसा संवाद जो कुरूक्षेत्र कि रणभूमि में तब हुवा था जब एक और अधर्मी कौरव कि सेना व दुसरी और धर्मपरायण पांडवों कि सेना आमने सामने खडी थी। उस समय अर्जुन ने विरोधी कौरवों कि सेना में अपने परिवार जनों को देख कर शस्त्र डाल दिये थे। अर्जुन का मत था कि परिवार जनों कि हत्या कर सिंहासन जितने से अच्छा होगा कि में सब-कुछ त्याग कर तपस्वी होना स्वीकार कर लूँ। अर्थात अर्जुन युद्ध का मार्ग छोड़ तपस्वी बनना चाहते थे लेकिन श्रीकृष्ण के भगवद ज्ञान ने अर्जुन को युद्ध हेतु तैयार किया। इनसे यह सिद्ध होता हैं कि भगवद्गीता मात्र साधु-संत के लिए नहीं प्रत्येक मानव जीवन के लिये हैं व गीता अध्यन से कोई परिवार छोड़ सन्यासी बनने कि दिशा में चल पड़े यह जरूरी नहीं। भगवत गीता में सांख्य योग व कर्म योग, दोनो ही तरीकों से जीवन सफल करने का मार्ग विस्तार से बताया गया हैं जिसमें कर्म करते हुवे परमात्मा को पाना अधिक श्रेष्ठ बताया हैं अर्थात सारे संसारीक कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए भी स्वयं को संपूर्ण मुक्त रखना।

४) पुराने युग कि बाते, आज जमाना बदल गया
५) केवल भारतीयों के लिए ही उपयोगी हैं

जैसा कि श्रीमद्भगवद्गीता में ज्ञान मनुष्य जिवन को श्रेष्ठ बनाने व सृष्टि कल्याण पर केंद्रित हैं अत: इसका किसी काल या क्षेत्र से कोई नाता नहीं। ५००० साल पहले जो मानव जिवन था वहीं मानवीय जीवन आज भी हैं। संपूर्ण विश्व में मानवीय जीवन जन्म, बालपन, जवानी व बुढ़ापे के चक्र पर ही आधारित हैं। जब भी, जहाँ भी मनुष्य जीवन व सृष्टि कल्याण का विषय होगा वहाँ भगवद्गीता का ज्ञान ही एक मात्र उपयोगी सिद्ध होगा।

६) मनगढ़ंत! काल्पनिक!
७) एक साधारण सी किताब

महाभारत व रामायण पर पूर्ण विश्व भर के जितने भी शोधकर्ताऔ ने अपने तरह-तरह के शोध में जो निष्कर्ष दिया हैं उसमे सभी पाया कि…

इन ग्रंथों में जितने भी स्थानों के नाम व उनकी स्थिति की दिशा का वर्णन किया हैं आज भी जस के तस उपलब्ध हैं

जहाँ रामसेतु व उसके तैरते पत्थर आज भी उपस्थीत हैं वहीं समुद्र में डूबी लंका, द्वारका नगरी व यमुना नदी भी जीता जागता प्रमाण हैं

महाभारत में हुवे युद्ध के कुरूक्षेत्र कि धरती व युद्ध में इस्तेमाल किये गये शस्त्र व उनके प्रभाव भी सिद्ध हो चुके हैं

ऐसे कई आधारभूत तथ्यों के आधार पर शोधकर्ताऔं ने स्वीकार किया हैं कि किसी भी सूरत में ना तो यह काल्पनिक हो सकते हैं और ना ही इन्हे झुठलाया जा सकता हैं।

महत्वपूर्ण बात यह भी हैं कि गीता के उपदेश आज भी पूर्णतया मनुष्य जीवन को प्रेरणा देने कि क्षमता रखते हैं और यही कारण हैं कि ना केवल भारत में, विदेशों में भी स्वेच्छा से इसे मानने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही व जिन्होंने अपने जीवन को सात्विकता के मार्ग पर लाकर परिवर्तन का अनुभव किया।

श्रीमद्भगवद्गीता के अध्यन के मानवीय लाभ ###

१) सर्वश्रेष्ठ पुस्तक जो किसी भी मनुष्य में आत्मविश्वास भरदे
२) मनुष्य जीवन को तीन सबसे बडे भय – बदनामी, असफलता व मृत्यु कि चिंता से मुक्त करने में सक्षम
३) सात्विक जीवन का ज्ञान व संसारीक माया से परे आनंदमय जीवन के रहस्य का सरलता से वर्णन
४) धर्म का संपूर्ण ज्ञान

यह मनुष्य जिवन व्यर्थ ना चला जाय
रहे सुनिश्चित ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ अपनाये

हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे

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सुनिये संपूर्ण श्रीमद्भागवद्गीता अब हिंदी में
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