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हम तो भक्त ठहरे! 

*हम भक्त तो अवश्य ही हैं….*
कुछ लोग हमे मोदी भक्त कहा करते थे… हमे भी कहलाने मे गर्व ही महसूस होता था क्योंकि कोई हमे क्या कहे यह हमारी समस्या कभी रही ही नहीं। 
लेकिन ये क्या? कुछ दिन से हमने मोदी भक्ति छोड योगी भक्ति कि शुरूवात कर दी! आश्चर्यजनक हैं ना! कुछ लोग तो अब भी चक्कर खा रहे कि अब इन्हें मोदी भक्त कहे या योगी भक्त!!!
भाई, कन्फ्यूजन में मत रहो… जिस तरह मोदी भक्त का ठप्पा हमने गर्व से सिर माथे लिया वैसे ही योगी भक्त का ठप्पा भी सिर माथे लेने में उससे भी अधिक गर्व ही होगा। आप अपने शाही परिवार के शहजादो व दामादो का झंडा गाड़ते रहो फिर वे चाहे खुद को दमदार साबित करने के लिए मोदी व योगी पर कितने ही तंज अकारण कसते रहे। जिस तरह आप उसमें खुश…. हम अपनी भक्ति में खुश। 
दरअसल समस्या हमारी भक्ति में हैं ही नहीं क्यों कि हम तो हिंदुत्व नाम के रेगिस्तान में भटके उस यात्री कि तरह हैं जो जल के एक कुंड मात्र मिल जाने से उसे प्रभु के प्रसाद जैसा सम्मान देने लगते हैं। आखिर ये कुंड ही तो हैं जिनके सहारे हम और अधिक यात्रा (युद्ध) कर सकने कि हमारी क्षमता में वृद्धि कर सकते हैं। इसलिए हम तो भक्ति करेंगे ही और यह हमारा अंतिम निर्णय हैं। और हाँ, हम किसी एसे कुंड कि पूजा तो कतई कर नहीं सकते जो रेगिस्तान में दुर से कुंड नजर आये किंतु उसमें जल तो छोड़ो किचड से भी नदारद हो! इसलिए जिसे भी हमसे अपनी भक्ति करवानी हो वह स्वयं को उपस्थित कुंडो से भी विशाल करे। 
हालांकि, अब तो संघर्ष और भी जटिल हैं… क्यूँ की पहले तो प्रतिस्पर्धा मात्र मोदी से थी, अब तो सामने योगी नजर आ रहे! और यह तो विश्वव्यापी हो चुका हैं कि हिंदुत्व नाम के रेगिस्तान में एक कुंड बन कर जल संचय करना कितना तपस्वी हो चुका हैं। 
*… किंतु महाकाल के*
जय महाराष्ट्र