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गणेशोत्सव विशेष

गणेशोत्सव विशेष

यदि आप गणेशजी की प्रतिमा घर में स्थापित करने कि सोच रहे हैं तो…

== प्लास्टर पेरिस कि मूर्ति बैठाने के पाप से बचे क्योंकि यह… 

     – –  धर्मानुसार नहीं

    – –  पर्यावरण विरोधी हैं साथ ही 

    – –  विसर्जन पश्चात अन गले टुकड़े आस्था को अपमानित करते हैं। 

== प्लास्टर पेरिस कि बड़ी मूर्ति कि अपेक्षा जल में त्वरित गलने वाली मिट्टी कि छोटी मूर्तियों को बैठाए जो की पुर्ण रूप से धार्मिक हैं। 

== बडी बड़ी व महंगी बिजली संचालित लाईटे व उपकरणों का इस्तेमाल ना करे व *चाईना छाप* तो बिलकुल ही ना वापरे, यह सजावट केवल आपके मन को भले ही आनंदित करेगी किंतु इनका धर्म से कुछ भी लेनादेना नहीं हैं और पर्यावरण व राष्ट्र विरोधी (चाईना हित में अथवा अनावश्यक बिजली खर्च) भी होगा। 

== उत्सव में उपयोगी प्रत्येक वस्तु कि खरीदारी बड़े बड़े शापिंग मालों से न कर सड़क पर बैठे व दुकान दारो से करे… एसा कर आप अपने उस्तव से कुई अन्य साधारण परिवार में भी उस्तव भर सकते हैं। 

== सजावट में कपड़े व सात्विक वस्तुओं का अधिकाधिक प्रयोग करे जैसे फुल, फल लकड़ी, आम पत्ते, केला पत्ता, नारियल… इत्यादि। 

इस तरह मनाया गया उत्सव आपको व आपके परिवार में सात्विक प्रथा को बल देगा जो वास्तविक फल प्राप्ति का एकमात्र मार्ग हैं। आडंबर रहित उत्सव ही हमारी संस्कृति कि पहचान हैं। 

जय श्री गणेश, जयतु जयतु हिंदुराष्ट्रम् 

हम मुर्ख क्यों बन जाते हैं! 

विदेशी कंपनियों ने भारतीयों को कैसे – कैसे मुर्ख बनाया… इसकी  *कोलगेट* सबसे बड़ी मिसाल हैं! 
जब इस कंपनी ने केमिकल से बना अपना पहला उत्पाद *कोलगेट टुथ पावडर* को बजार में लाया था तब चुले कि राख से मंजन करने वालों को एक पहलवान के विज्ञापन से समझाया था… खुरदरे प्रदार्थो से दांत खराब हो जाते हैं इसलिए डेंटिस्ट का सुझाया कोलगेट पावडर! (करोड़ों कमाए) 
फिर कुछ दिनो के बाद लोगों के साधारण टुथ ब्रश को हटवा कर खुद का खुरदरा *कोलगेट जिगजेग* लोगों को थमा दिया ताकि दाँतों के कौने कोने कि सफाई हो सके!! यह भी डेंटिस्ट का सुझाया था!!! (करोड़ों कमाए) 
पहले कई प्रांतों में ग्रामीण लोग नमक से ही मंजन कर लिया करते थे तब इसी कोलगेट कंपनी ने अपने उत्पाद के प्रचार हेतू अपने एक विज्ञापन के जरिये नमक को दांतों के लिए हानिकारक बताया था… और आज वही कंपनी विज्ञान बता-बता कर लोगों से पूछ रही –  क्या आपके टूथपेस्ट में नमक हैं!!!  तब भी नमक को हानिकारक बताने के लिए इनके पास डेंटिस्ट था और आज भी लाभदायक बताने को डेंटिस्ट हैं!!! (करोडों की कमाई जारी है) 
यह तो सभी जानते हैं कि यह विदेशी कंपनी अमेरिका की हैं लेकिन यह कितने लोग जानते होंगे कि जिस धड़ल्ले से यह कंपनी भारत में धंधा जमाये बैठी हैं उस धड़ल्ले से वह अमेरिका में बिक्री नहीं कर पाती… इसका सिधा कारण यह है कि कोलगेट एक विषैला उत्पाद है जिसकी अधिक मात्रा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं।  अमेरिका में इन्हें अपने उत्पादों पर नियमानुसार चेतावनी के रूप में लिखना होता हैं कि – कृपया बच्चों की पहुँच से दुर रखे! 
लेकिन यहाँ भारत में अपने विषैले उत्पाद के विज्ञापनों में मुख्य रूप से बच्चों को पसंद आने वाले स्वाद को आकर्षण बनाया जिससे मुख्य रूप से लक्ष्य बच्चे – बच्चे के दिमाग पर अपने उत्पाद को छाप देना था! जरा सोचों!… जिस उत्पाद के लिए अमेरिका में “बच्चों से दुर रखने” जैसी चेतावनी जरूरी हो वही उत्पाद भारत में बच्चों को लुभाने में लगा हैं!!! 
बच्चों पर कितना दुष्परिणाम हो सकता था! विश्वास किजिये… एसा बहुत बडे पैमाने पर हुवा भी लेकिन कमाई भी अरबों-खरबों कि थी… बच्चों पर हुवे सैकड़ों दुष्परिणामों की आवाजों का गला घौट दिया गया। लेकिन जब किस्सो कि संख्या हद से भी बाहर जाने लगी तो मजबूर कंपनी को एक विज्ञापन उतार पड़ा जिसमें बच्चों को समझाते हुए संदेश दिया गया कि –  “कोलगेट का असर हैं ज्यादा, इसलिए टूथपेस्ट लगा हो आधा”!!! हम भारतीय तो वैसे भी विदेशी कंपनियों की चकाचौंध में अंधे रहते हैं तो इन सब सत्य को कहाँ देख पाते! सो करोड़ों की इनकी कमाई चलती रही। 
लेकिन आज जैसे – जैसे कंपनी की हकीकत लोगों तक पहुंच रही कंपनी की बिक्री लगातार गिरावट पर हैं। आजकल कंपनी और एक विज्ञापन चला रही जिसमें कई माँ रूप में बैठी मॉडल के कहलवा रहे कि “कोलगेट पर सालो से भरोसा हैं तो मैं भला मेरे बच्चों को और कोई टूथपेस्ट कैसे दे सकती हूँ… मेरे बच्चों के लिए सिर्फ कोलगेट”!!!! अब तो इस विदेशी कंपनी ने भी केमिकल छोड़ कर देशी नाम का विदेशी मंजन *वेदशक्ति* लांच किया हैं और अब भी एसे कई मुर्ख हैं जो इसे खरीदने को उतारू होंगे!!! 
ध्यान रहे कोलगेट कि बिक्री गिरी जरूर हैं लेकिन अब भी इनका धंधा करोड़ों में हैं। जानते हैं आज भी कंपनी करोड़ों क्युँ कमा रही….? *क्युँ की आज भी गाँव के भोले-भाले से लेकर शहर के पढ़े-लिखों तक नें कभी भी मंजन या टूथपेस्ट कहना नहीं सिखा… सिखा तो मात्र कोलगेट कहना।* 
संभवतः अब इस प्रश्न के उत्तर से भी आप सरोकार हो गये होंगे कि कोलगेट डेंटिस्टो कि पहली पसंद क्यों रही… भाई इसकी बदौलत ही तो आज डेंटिस्टों के यहाँ केमिकल से कमजोर हो पडे दाँतों वाल मरीजों कि भरमार हो रही। 
यह तो मात्र एक विदेशी उत्पाद की कहानी थी एसी ही कहानी विदेशी कोल्ड ड्रिंक जो कि वास्तव में टोयलेट क्लिनर होता हैं, जैसे अनेकों उत्पाद भारतीयों को धीमे विष की तरह परोसे जा रहे और हम अपनी मेहनत की कमाई इन पर लूटवा रहे। 
*जागो और जगाओ,*

*देश नहीं तो कम से कम अपनी सेहत तो बचाओ!*
(कृपया अपने तक ना सिमित रखे… हर भारतीय तक पहुँचाने का कष्ट करें) 

​अब भोगी नहीं बल्कि योगी शासन करेंगे 

​अब भोगी नहीं बल्कि योगी शासन करेंगे 
नरेंद्र मोदी द्वारा योगी अदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाये जाने का सिधा संकेत…. 
🚩 भांड मिडिया कितना भी विधवा विलाप करले… मोदी को तिल जितना भी फर्क नहीं पड़ता 
🚩 विकास एजेंडा के चलते मोदी की हिंदुत्व के लिये निष्ठा अप्रभावित 
🚩 सेक्युलर किडो को कब-कहाँ-कितनी पेस्टीसाईड देने हैं यह मोदी अच्छी तरह जानते हैं… ये किडे आज भले ही तुरंत खत्म नहीं किये जा रहे, लेकिन इनकी जड़ों को खोदना शुरू हो चुका हैं 
🚩 उत्तर प्रदेश के विकास सहित सांस्कृतिक रक्षा हेतु मोदी बेहद गंभीर व पूर्ण रूप से परिपक्व 
🚩 यह उत्तर प्रदेश में राम मंदिर सहित राम-राज्य स्थापित करने कि और एक एतिहासिक कदम
🚩 भविष्य में मोदी के और अधिक तेज धारी व खतरनाक रणनीति का आगाज 
जय जय श्री राम 🚩🚩🚩

नारी तु नारायणी 

​मैं एक स्त्री हुँ… 👩‍👧‍👦
जब जन्मी तब पिताजी का नाम मिला…

 यह पिताजी का गर्व था
माता-पिता ने मुझे पहनावे व 

चाल-चलन के संस्कार सिखाये

और जिन्हें अपना कर मेैने अपने परिवार 

के स्वाभिमान का मस्तक सदैव उचा रखा

 यह मेरी जिम्मेदारी थी
विवाह पश्चात पति का नाम मिला

नया घर व परिवार में सम्मान मिला

 यह मेरा हक था
पुत्र – सुपुत्री को मैंने अपने संस्कारों में ढाला

उन्हे हमारे इतिहास व अध्यात्म से जोड़ा 

जिससे समाज व देश के ‘कल’ को 

मेरे परिवार से भावी पीढ़ी मिले

 यह मेरी चुनौती थी
नारी कि समझ पर ही जन-जीवन 

व संपूर्ण सृष्टि का मंगल टिका हुआ हैं…

यह ज्ञान मात्र हमारी संस्कृति कि ही देन हैं। 
मैं एक भारतीय नारी हुँ इसलिए मैं अपनी जिम्मेदारी समझती हूँ…. और मुझे अपनी इस समझ पर गर्व हैं। 
सिर्फ महिला दिवस कहने में कोई दम नहीं 

आओ मनाए… भारतीय महिला दिवस
🚩 सभी बहनों को हार्दिक शुभकामनाएँ 🚩

…. और पढे़…. 

*भारतीय महिलाएं प्राचीन काल से ही हैं आर्थिक क्षमता संपन्न*
वामपंथी विचार धारा वाले इतिहासकारों व समाजिक बुद्धिजीवियों ने हमें हमारी पाठ्यपुस्तकों में पढ़ने को मजबूर किया कि हमारी भारतीय संस्कृति में महिलाएं केवल घरेलू कार्यभार ही संभालती आई हैं व घर कि आमदनी में उनका योगदान केवल शुन्य ही हुवा करता था!!!
क्या यह सत्य हैं? 
अब देखिए… यह कितना विरोधाभास ज्ञान हैं। यह तो सभी जानते हैं कि भारत एक कृषि प्रधान देश रहा हैं अर्थात अधिक तर पूर्वकालिन परिवार कृषि व गोपालन पर ही आधारित होते थे। और इन दोनो ही कार्यों में किसान कभी अकेला नहीं होता हैं बल्कि पुरा परिवार उसका हाथ बटाता हैं। फिर भले ही वह किसान कि माता हो, बहन हो, पत्नी हो अथवा पुत्री हो…. सभी अपनी क्षमता के अनुरूप योगदान करते हैं। कृषि व गोपालन दोनो ही परिवार को आर्थिक सबलता प्रदान करते हैं फिर किस आधार पर ये बुद्धिजीवी भारतीय प्राचीन परंपरा में महिलाओं को केवल घरेलू कार्यभार संभालने तक का ठप्पा लगाकर प्रस्तुत करते आये हैं? 
आज भी कई पढ़े-लिखों कि सोच में इन वामपंथियों द्वारा प्रस्तुत किया गया नजरिया ही जमा हुवा हैं जिससे वे हमेशा भारतीय परंपरा को कोसते नजर आते हैं।  

#KnowYourEnamy #KnowOurVedicCulture #KnowYourHistory

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​क्यों नहीं बन पाया अब तक अयोध्या में श्री राम मंदिर
सवाल तो बहुत मजबूत हैं लेकिन जवाब भी जान ले…. 
अगर आप देश के किसी भी कोने में 

किसी भी दस मुस्लिम से यह प्रश्न करोगे कि 

अयोध्या में क्या बनाया जाये… 
दस के दसों एक आवाज में कहेंगे… सिर्फ बाबरी मस्जिद
लेकिन यही प्रश्न आप दस हिंदु से पूछ के देख लो… 

पुरे देश में घुमने कि जरूरत भी नहीं, उत्तर प्रदेश के ही दस हिंदु से पूछ लेना… मुश्किल से 1 या 2 हिंदु मिलेगा जो यह कहने की हिम्मत करेगा कि वहाँ सिर्फ श्री राम का मंदिर बनना चाहिए… शेष मुर्ख या तो कहेंगे कि अस्पताल या स्कूल बना दिया जाए या फिर मंदिर-मस्जिद दोनो साथ में बनाने को सही ठहरा देगा!!! 
निष्कर्ष यह.. कि इस देश का हिंदु इतना भटक चुका हैं कि ना ही उसे धर्म का ज्ञान हैं और ना ही अयोध्या के इतिहास का ज्ञान… लेकिन मुस्लिम समुदाय पुरी तरह एक राय से संगठीत हैं… भाई, दर शुक्रवार एसे ही थोडे अपना धंधा-पानी छोड के भागे चलते हैं!!! 
मंदिर ना बनने का बडा दोष उनका भी हैं जो अपनी जाती, अपने समुदाय, भाई-भतीजावाद के चलते मंदिर तो छोडो, अपने राज्य व अपने घर कि महिलाओं कि रक्षा को भी ताक पर रख कर आरक्षण कि भीख में वोट नेताओं के पीछे चल पड़ते हैं…. सोच कर देख लो,  सिर्फ राममंदिर के नाम पर ही नेता चुन लेते तो वाकई प्रदेश सहित पुरे भारत का उद्धार हो जाता! 
जय श्री राम

“दंगल” से मीट लोबी को बढ़ावे का षडयंत्र

“दंगल” से मीट लोबी को बढ़ावे का षडयंत्र

सुदर्शन न्यूज कि दंगल कि “असत्य” कथा का सत्य बताया #BindasBol में…. षडयंत्रों की भरमार, पहलवानों की भारतीय संस्कृति पर चोट। 

क्या हैं मुद्दा?

दंगल को अमीर ने जिस पहलवान महावीर पोगाट कि सत्य कथा पर आधारित बताया हैं वे यथार्थ में एक शुद्ध शाकाहारी पहलवान हैं। 

सुदर्शन न्यूज को वे जाहिर कर चुके हैं कि ना ही उन्होंने कभी मांसाहार को कभी छुआ हैं और ना ही कभी उन्होंने अपनी बेटियों को मांसाहार करवाया हैं। 

यहाँ तक कि उनकी दोनो बेटियाँ गीता फोगाट व बबीता फोगाट स्वयं अपने पीता कि तरह शुद्ध शाकाहारी हैं। उन्होंने इस फिल्म को स्वयं के जीवन पर कलंक बताया। 

महावीर फोगाट जो कि स्वयं एक पहलवान हैं व बजरंगबली के परम भक्त हैं लेकिन उनकी एसी भक्ति को उनके जीवन पर आधारित बताये जाने वाली तथाकतित फिल्म दंगल से पूर्णतया नदारद कर दिया गया। 

अन्य पहलवानों की राय

इस मुद्दे पर बहस के लिए कई नामी पहलवान सुदर्शन न्यूज पर आमंत्रित किये गये थे जिन्होंने दंगल में दिखाए गए मांसाहार को बढ़ावा देने जैसे दृश्य पर कडी प्रतिक्रिया व्यक्त की। 

एक नवयुवा पहलवान आदित्य परासर के अनुसार भारत के जीतने भी अखाड़े जहाँ पहलवानी सिखाई जाती हैं वहाँ पहलवानी की पहली शिक्षा शुद्ध शाकाहारी खान पान की होती हैं। 

आदित्य आगे कहते हैं कि मेरे जैसे पहलवान के लिये पहलवानी जिसे एक पूजा मान कर निभाते हैं व हम अपनी पूजा में मांस-मदीरा के सेवन कि सोच भी नहीं सकते। 

सभी पहलवानों ने एक राय में जाहिर किया कि पहलवानी कि शुरूवात ही बजरंगबली कि अराधना से प्रारंभ होती हैं लेकिन दंगल नें महावीर फोगाट जैसे हनुमान भक्त पहलवान को एक नास्तिक रूप से प्रकट कर पहलवानों कि भारतीय सभ्यता को दबाने का षडयंत्र किया है। 

सुरेश चव्हाण ने आमीर खान कृत दंगल में मांसाहारी मानसिक को दिखाने व बजरंगबली कि भक्ती को फिल्म से अलग करने के पिछे दो षड्यंत्र कि संभावना व्यक्त की जिसमें पहली देश में मांस उद्योग का प्रचार व दुसरी फिल्म PK कि तरह मूर्ति पूजा का परहेज हैं। 

#SudarshanNews पर लगातार जारी दुसरे दिन भी बिंदास बोल में इस मुद्दे पर जोरदार बहस जारी रही किंतु #SureshChavhan (@chavhanke) के कडे प्रयत्नों का बावजूद ना ही आमीर खान या दंगल फिल्म से जुडे किसी ने भी अबतक कोई अपना पक्ष रखा। इससे जाहिर होता हैं कि वे अपना मुँह छिपाते फिर रहे। 

Twitter: @SudarshanNewsTV 

तीन तलाक और हलाला

​तीन तलाक और हलाला

जैसे ही लाॅ कमीशन ने UNIFORM CIVIL CODE के लिए पहल करते हुवे जनता कि राय क्या मांगी, मिडिया ने अपनी बहस को केवल तीन तलाक पर केंद्रित कर दिया।

हालांकि UNIFORM CIVIL CODE में तलाक सिर्फ यही एक मुद्दा नहीं हैं इसमें और भी कई मुद्दे हैं लेकिन मिडिया ने केवल तलाक को इसलिए प्रचारित किया क्योंकि वे जानते हैं कि देश के मुस्लिम वर्ग में बैठे धर्म के ठेकेदारों के लिए यह एक दुखती नस हैं। यदि इस मुद्दे के जरिए उन्हें उकसाया गया तो वे चुप नहीं बैठेंगे। यहाँ तक की वे मार-काट पर भी उतर सकते हैं और यही बात उन्होंने मिडिया के समक्ष जाहिर भी कर दी। UCC का विरोध वे मात्र एक ही आधार पर कर सकते हैं और वो है उनका धर्म क्यों कि शेष सभी तर्क उनके ही वर्ग के सामान्य सभी मुस्लिमों के लिए लाभकारी हैं जिससे उनकी बोलती ही बंद हो जाती हैं। लेकिन ये धर्म के ठेकेदार खुद के लाभ को ध्यान में रखते हुए UCC के विरोध में देशभर के मुस्लिम युवकों को भ्रमित करने को उतारू नजर आ रहा। 

इसे समझने के लिए यह समझना जरूरी हैं कि तीन तलाक का मुद्दा क्या हैं। जिस तरह लगभग अन्य सभी समुदायों में तलाक का एकमात्र जरिया अदालत का दरवाजा हैं वहीं धर्म को आधार बनाकर मुस्लिम वर्ग ने कानूनी प्रक्रिया को नकारते हुवे खुद के लिए शरियत कानून कि आजादी हासिल कि हैं। जिसके अनुसार तीन-तलाक व हलाला प्रक्रिया लागु होती हैं। शरियत नियमानुसार क्या होना चाहिए यह बेहद अलग विषय हैं लेकिन इसकी आड़ में जो भी कुछ मुस्लिम समुदाय में प्रचलन चल रहा हैं वह ना तो मानवीय हैं और ना ही सभ्य कहलाने लायक हैं। तीन-तलाक कि प्रथा से सबसे बड़ी प्रताड़नाओ से यदि किसी को गुजरना पड़ रहा तो वह हैं मुस्लिम समुदाय कि महिलाएं। 

तीन-तलाक कि प्रकिया 

— यदि शौहर ने अपनी बेगम को तीन दफा तलाक-तलाक-तलाक कह दिया या मात्र जाहिर भी कर दिया तो तलाक मान लिया जाता हैं। 

— ना ही कोई लिखा पढ़ी और ना ही कोई अतिरिक्त प्रक्रिया और ना ही पत्नी कि रजामंदी बस पति-पत्नी के मध्य रिश्ता खत्म। 

— पती ने पत्नी के भविष्य निर्धारित करने वाले यह तीन शब्द “तलाक” किस अवस्था में या जरिए से कहे वह कोई मायने नहीं रखते। 

— फिर चाहे वह आपसी झगड़े के चलते पति गुस्से में हो या शराब के नशे में हो, पत्नी सामने हो या दुर मायके में हो, जरिया चाहे फोन हो, SMS हो या फिर फेसबुक अथवा ट्विटर ही क्यों ना हो…. यह सब जायज माना जायेगा व इसके बाद तो पति-पत्नी चाहे तो भी वे इसे नहीं बदल सकते। 

— पति अपनी छोड़ी गई पत्नी व जितने भी बच्चे हो, उनकी जिम्मेदारी पूरी तरह मुक्त हो जाता हैं व किसी भी रूप से उनके आर्थिक सहायता के लिए बाध्य नहीं रहता। 

— पत्नी को ताउम्र ना केवल स्वयं के बल्कि उन बच्चों के पालन पोषण के बोझ झेलने के लिए छोड़ दिया जाता हैं। 

यह अपरिवर्तित हैं व पति-पत्नी दोनों के लिए बाध्य हैं क्योंकि इन तीन शब्दो के बाद पति-पत्नी के मध्य इनके धार्मिक ठेकेदार धर्म का नाम लेकर ऐसी दिवार बनकर खड़े हो जाते हैं कि उनके आगे किसी की नहीं चल सकती। 

यहाँ तक कि स्थिति तो स्त्रियों के लिए नर्क जैसी ही हैं लेकिन उससे भी बड़ी जिल्लत का सामना उन्हें तब करना पड़ता हैं जब यदि वही पति उसे फिर अपनाना चाहें। लेकिन अब ऐसा तब तक संभव नहीं जब तक धर्म के ठेकेदार हटते नहीं। इन धर्म के ठेकेदारों के अनुसार एक तलाकशुदा पति अपनी पहली पत्नी को फिर से मात्र तभी अपना सकता हैं जब उसकी पत्नी हलाला प्रक्रिया से गुजरे और इनके ही अनुसार यह शरियत के मुताबिक हैं। और यहीं से दुकानदारी व अय्याशी शुरू होती हैं इन धर्म के ठेकेदारों कि। हलाला! क्यूँ कि जब शरियत अनुसार ही निकाह व तलाक हुवा हैं तो तलाक उपरांत पति-पत्नी के मध्य जो संबंध खत्म हुवे या किये गये हैं उसे पुन: स्थापित करने के के लिए जो प्रकिया अपनाई जाती हैं उसका ही नाम हैं हलाला। 

क्या है हलाला पक्रिया 

— इन धार्मिक ठेकेदार के अनुसार एक तलाकशुदा पति अपनी पूर्व पत्नी को अपनाये उससे पहले पत्नी को किसी और गैर-मर्द से निकाह करना होगा
— उस पत्नी को नये पति के साथ एक रात हमबिस्तर भी होना होगा

— ऐसी एक रात के बाद नये पति द्वारा उस पत्नी को तलाक देना होगा लेकिन इस तलाक के पहले तब तक इंतजार करना होगा जब तक कि पत्नी का एक मासिक धर्म ना बिते और यदी ऐसा ना हुवा तो तलाक भी नहीं हो पायेगा। 

— इस दुसरे तलाक के बाद पहला पति अपनी पूर्व पत्नी से फिर से निकाह कर सकता हैं। 

जाहिर हैं कि इस तलाक व हलाला की प्रक्रिया में औरत को मात्र एक खिलौना मान कर चला जाता हैं। यदि एक पति ने गलती से भी तीन तलाक कह दिया तो उसका खामियाजा उसे नहीं भुगतना बल्कि सारी आफते मात्र पत्नी को ही झेलना हैं। 

तलाक जैसी प्रक्रिया का इतना लचीला होने की वजह से ही देश में सबसे बड़ी तादाद तलाक कि मात्र मुस्लिम समुदाय को ही समर्पित हैं। लाखों छोड़ी गई महिलाएं खुद का व बच्चों के भार उठाने को मजबूर हैं। जहाँ ऐसी प्रथा धार्मिक ठेकेदारों के लिए कमाई व अय्याशी का श्रोत बनी हुई हैं वहीं ना केवल पुरे मुस्लिम समुदाय को अधर में धकेल रही बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए बेरोजगारी, अशिक्षा, गरीबी व जनसंख्या अनुपात हिलाने जैसी समस्याएं फैलाकर खतरनाक सिद्ध हो चुकी हैं। 

आवाज उठाये ऐसी प्रथा को खत्म करने के लिए, यही मौका हैं।